यह पृष्ठ जाँच लिया गया है।
वरदान
२८
 


यह बहू वनकर मेरे घर में श्रावे,तो घर का भाग्य जाग उठे। उसने सुशीला पर अपना यह भाव प्रगट किया। विरजन को तेरहवां अरम्भ हो चुका था। पति-पत्नी में विवाह के सम्बन्ध में बातचीत हो रही थी। प्रेमवती की इच्छा पाकर दोनों फूले न समाये । एक तो परिचित परिवार,दूसरे कुलीन लड़का,बुद्धिमान और शिक्षित,पैतृक सम्पत्ति अधिक। यदि इनमें नाता हो जाय तो क्या पूछना। चटपट रीति के अनुसार सन्देश कहला भेजा।

इस प्रकार सयोग ने आज उस विषैले वृक्ष का बीज बोया,जिसने तीन ही वर्ष में कुल का सर्वनाश कर दिया । भविष्य हमारी दृष्टि से कैसा गुप्त रहता है?

ज्योंही सदेशा पहुँचा,सास,ननद और बहू में बातें होने लगीं।

बहू (चन्द्रा)-क्यों अम्माँ। क्या आप इसी साल व्याह करेंगी?

प्रेमवती-और क्या,तुम्हारे लालानी के मानने की देर है ।

वहू--कुछ तिलक-टहेन भी ठहरा?

प्रेमवतो-तिलक-दहेज ऐसी लड़कियों के लिए नहीं ठहराया जाता।जब तुला पर लड़की लड़के बराबर नहीं ठहरती, तभी दहेज का पासड बनाकर उसे बराबर कर देते हैं। हमारी वृजरानी कमला से बहुत भारी है।

सेवती-कुछ दिनों घर में खूब धूमधाम रहेगी। भाभी गीत गायेंगी। हम ढोल बनायेंगे। क्यों भाभी?

चन्द्रा--मुझे नाचना-गाना नहीं आता।

चन्द्रा का स्वर कुछ भद्दा था,जब गाती,स्वर-भङ्ग हो जाता था। इसलिए उसे गाने से चिढ थी।

सेवती-यह तो तुम श्राप ही कहो। तुम्हारे गाने की तो ससार में धूम है।

चन्द्रा जल गयी,तीखी होकर बोली-जिसे नाच-गाकर दूसरों को लुभाना हो,वह नाचना-गाना सीखे।

सेवती-तुम तो तनिक-सी हंसी में रूठ जाती हो। नरा वही गीत