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शिष्ट जीवन के दृश्य
 

महरी मुसकराती हुई बोली-श्राप खोलेंगे तो पता चल जायगा।

मुन्शीनी ने विस्मित होकर लिफाफा खोला। उसमें से जो पत्र निकला उसमें यह लिखा हुआ था-

'बाबा को विरजन का प्रणाम और पालागन पहुंचे। यहाँ श्रापकी कृपा से कुशल-मंगल है। आपका कुशल श्रीविश्वनाथनी से सदा मनाया करती हूँ। मैंने प्रताप से भाषा सीख ली। वे स्कूल से श्राकर सन्ध्या को मुझे नित्य पढाते हैं। अब आप हमारे लिए अच्छी-अच्छी पुस्तके लाइए,क्योंकि पढ़ना ही जीवन का सुख है और विद्या अमूल्य वस्तु है। वेद-पुराण में इसका माहात्म्य लिखा है। मनुष्य को चाहिए कि विद्या-धन तन-मन से एकत्र करे। विद्या से सब दुःख दूर हो जाते हैं। मैंने कल वैतालपचीसी की कहानी चची को सुनायी थी। उन्होंने मुझे एक सुन्दर गुड़िया पुरस्कार में दी है। बहुत अच्छी है। मैं उसका विवाह करूँगी,तब श्रापसे रुपए लूंगी। मैं अब पण्डितजी से न पहूँगी। मा नहीं जानती कि मैं भाषा पढती हूँ। ।।

यापकी प्यारी
 
विरजन'
 

प्रशस्ति देखते ही मुन्शीनी के अन्त करण में गुटगुटी होने लगी। फिर तो उन्होंने एक ही साँस में सारी चिट्ठी पढ डाली। मारे ग्रानन्द के नगे-पांव हँसते हुए भीतर दौड़े। प्रताप को गोद में उठा लिया,और फिर दोनों बच्चों का हाथ पकड़े हुए सुशीला के पास गये। उसे चिट्ठी दिखा-कर कहा-बूझो,किसकी चिट्ठी है?

सुशीला-लाश्रो हाथ में दो,देखू।

मुन्शीजी-नहीं,वहीं से बैठी-बैठी बतायो,जल्दी!

सुशीला-बूझ जाऊँ तो क्या दोगे?'

मुन्शीजी-पचास रुपये दूध के धोये हुए। .

सुशीला-पहिले रुपये निकालकर रख दो,नहीं तो मुकर बायोगे।