यह पृष्ठ जाँच लिया गया है।
१५९
प्रेम का स्वप्न
 

शून्य था, तब वह आ-आकर उसमे आँसुओं की पुष्प चढाती थी। आज जब देवता ने वास किया है, तो वह क्यों इस प्रकार मचल-मचलकर आ रही है?

रात्रि भली-भाँति आर्द्र हो चुकी थी। सड़क पर घण्टों के शब्द सुनायी दे रहे थे। माधवी दवे-पाँव बालाजी के कमरे के द्वार तक गयी। उसका हृदय धड़क रहा था। भीतर जाने का साहस न हुआ, मानो किसी ने पैर पकड़ लिए। उलटे पाँव फिर आयी और पृथ्वी पर बैठकर रोने लगी। उसके चित्त ने कहा―माधवी! यह बड़ी लज्जा की बात है। बालाजी की चेरी सही, माना कि तुझे उनसे प्रेम है; किन्तु तू उनकी स्त्री नहीं है। तुझे इस समय उनके गृह में रहना उचित नहीं है। तेरा प्रेम तुझे उनकी पत्नी नहीं बना सकता। प्रेम और वस्तु है और सोहाग और वस्तु है। प्रेम चित्त की प्रवृत्ति है और ब्याह एक पवित्र धर्म है। तब माधवी को एक विवाह का स्मरण हो आया। वर ने भरी सभा में पत्नी की बाँह पकड़ी थी और कहता था कि इस स्त्री को मैं अपने गृह की स्वामिनी और अपने मन की देवी समझता रहूॅगा। इस सभा के लोग, आकाश, अग्नि और दवता इसके साक्षी रहें। हा! ये कैसे शुभ शब्द हैं! मुझे कभी ऐसे शब्द सुनने का सौभाग्य प्राप्त न हुआ! मैं न अग्नि को अपना साक्षी बना सकती हूँ, न देवताओं को और न आकाश ही को; परन्तु हे अग्नि ! हे आकाश के तारों! और हे देवलोक-वासियों! तुम साक्षी रहना कि माधवी ने बिलाजी की पवित्र मूर्ति को हृदय में स्थान दिया; किन्तु किसी निकृष्ट विचार को हृदय में न आने दिया। यदि मैने घर के भीतर पैर रखा हो तो ऐ अग्नि! तुम मुझे अभी जलाकर भस्म कर दो। हे आकाश! यदि तुमने अपने अनेक नेत्रों से मुझे गृह में जाते देखा हो, तो इसी क्षण मेरे अपर इन्द्र का वज्र गिरा दो।

माधवी कुछ काल तक इसी विचार में मग्न बैठी रही। अचानक उसके कान में भक-भक की ध्वनि आयी। उसने चौंककर देखा तो बालाजी का