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वरदान
 

वरदान १४६ बिरजन-अच्छा, अब इस विवाद को जाने दो। तुम दोनों जब आती हो, लड़ती ही आती हो । सेवती-पिता और पुत्र का कैसा सयोग हुआ है ? ऐसा मालूम होता है कि मुन्शी शालिग्राम ने प्रतापचन्द्र ही के लिये सन्यास लिया था। यह सब उन्हीं की शिक्षा का फल है । रुक्मिणी-हाँ और क्या ? मुन्शी शालिग्राम तो अब स्वामी ब्रह्मा- नन्द कहलाते हैं । प्रताप को देखकर पहचान गये होंगे। सेवती-आनन्द से फूले न समाये होंगे। रुक्मिणी-यह भी ईश्वर की प्रेरणा थी, नहीं तो प्रतापचन्द्र मान- सरोवर क्या करने जाते? सेवती-ईश्वर की इच्छा के बिना कोई बात होती है ? बिरजन—तुम लोग मेरे लालाजी को तो भूल ही गयीं। ऋषिकेश में पहले लालाजी ही से प्रतापचन्द्र की भेट हुई थी। प्रताप उनके साथ साल-भर तक रहे । तब दोनों आदमी मानसरोवर की ओर चले। रुक्मिणी-हाँ, प्राणनाथ के लेख में तो यह वृत्तान्त था। बालाजी तो यही कहते हैं कि मुन्शी सनीवनलाल से मिलने का सौभाग्य मुझे प्राप्त न होता, तो मैं भी मांगने-खानेवाले साधुओं में ही होता। चन्द्रकुँवर-इनकी आत्मोन्नति के लिए विधाता ने पहले ही से सब सामान कर दिये थे। सेवती-तभी इतनी-सी अवस्था में भारत के सूर्य बने हुए हैं। अभी पचीसवें वर्ष में होंगे? बिरजन-नहीं, तीसवां वर्ष है, मुझसे साल भर के जेठे हैं। सेवती-सुवामा तो उनकी कीर्ति सुन-सुनकर बहुत खुश होती होंगी। रुक्मिणी-मैंने तो उन्हें जब देखा, उदास ही देखा। चन्द्रकुँवर—उनके सारे जीवन की अभिलाषाओं पर ओस पड़ गयी। उदास क्यों न होगी?