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विदुषी वृजरानी
 

और अन्य सामग्रियाँ भी आ पहुॅची। यह घाव पर नमक का छिड़काव था।

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प्रेमवती के मरने का समाचार पाते ही प्राणनाथ पटना से और राधाचरण नैनीताल से चले। उसके जीते-जी आते तो भेंट हो जाती, मरने पर आये तो उसके शव को भी देखने का सौभाग्य न हुआ। मृतक-संस्कार बड़ी धूम से किया गया। दो सप्ताह गॉव में बड़ी धूम-धाम रही। तत्पश्चात् राधाचरण मुरादाबाद चले गये और प्राणनाथ ने पटना जाने की तैयारी प्रारम्भ कर दी। उनकी इच्छा थी कि स्त्री को प्रयाग पहुॅचाते हुए पटना जायँ। पर सेवती ने हठ किया कि जब यहॉ तक आये हैं, तो विरजन के पास भी अवश्य चलना चाहिये, नहीं तो उसे बड़ा दुःख होगा। समझेगी कि मुझे असहाय जानकर इन लोगों ने भी त्याग दिया।

सेवती का इस उचाट भवन में आना मानो पुष्पो में सुगन्ध का आना था। सप्ताह भर के लिए सुदिन का शुभागमन हो गया। विरजन बहुत बहुत प्रसन्न हुई और खूब रोयी। माधवी ने मुन्नू को अङ्क में लेकर बहुत प्यार किया। बाहर की बैठक कई मास से बन्द थी, आज उसके भी भाग्य जागे। उजड़ा हुआ घर बसा।

प्रेमवती के चले जाने पर विरजन उस गृह में अकेली रह गई थी। केवल माधवी उसके पास थी। हृदय-ताप और मानसिक दुःख ने उसका वह गुण पटक कर दिया, जो अब तक गुप्त था। वह काव्य और पद्य-रचना का अभ्यास करने लगो। कविता सच्ची भावनाओं का चित्र है और सच्ची भावनाएँ चाहे वे दुःख की हो या सुख की उसी समय सम्मन्न होती है जब हम दुःख या सुख का अनुभव करते हैं। विरजन इन दिनों रात-रात बैठी भाषा में अपने मनोभावो के मोतियों की माला गूँथा करती। उसका एक एक शन्द करुणा और वैराग्य से परिपूर्ण होता था। अन्य कवियों के मनों में मित्रों को वाह-वाह और काव्य-प्रोमियों के साधुवाद से