यह पृष्ठ जाँच लिया गया है।
१११
प्रतापचन्द्र और कमलाचरण
 

वक्तृताएँ ऐसी ओजस्विनी और तर्क-पूर्ण होती थीं कि प्रोफेसरों को भी उसके विचार और विषयान्वेषण पर आश्चर्य होता था। उसकी वक्तृता और उसके खेल दोनों ही प्रभाव-पूर्ण होते थे। जिस समय वह अपने साधारण वस्त्र पहिने हुए प्लेटफॉर्म पर जाता, उस समय सभास्थित लोगों की ऑखें उसकी ओर एकटक देखने लगतीं और चित्त में उत्सुकता और उत्साह की तरगें उठने लगतीं। उनका वाकचातुर्य, उसके संकेत, उसका मृदुल उच्चारण, उसके अङ्गोपाङ्ग की गति, सभी ऐसे प्रभाव-पूरित होते थे मानो शारदा स्वय उसकी सहायता करती है। जब तक वह प्लैटफॉर्म पर रहता सभासदों पर एक मोहिनी-सी छायी रहती, उसका एक-एक वाक्य हृदय में भिद जाता और मुख से सहसा “वाह वाह!" के शब्द निकल जाते। इसी विचार से उसकी वक्तृताएँ प्रायः अन्त में हुआ करती थीं, क्योंकि बहुधा श्रोतागण इसी की वाक्तीक्ष्णता का आस्वादन करने के लिए आया करते थे। उसके शब्दों और उच्चारणों में स्वामाविक प्रभाव था। साहित्य और इतिहास उसके अन्वेषण और अध्ययन के विशेष विषय थे। जातियो की उन्नति और अवनति तथा उसके कारण और गति पर वह प्रायः विचार किया करता था। इस समय उसके इस परिश्रम और उद्योग के प्रेरक तथा वर्द्धक विशेष कर श्रोताओ के साधुवाद ही होते थे और उन्हीं को वह अपने कठिन परिश्रम का पुरस्कार समझता था। हॉ उसके उत्साह की यह गति देखकर यह अनुमान किया जा सकता था कि वह हानहार विरवा आगे चलकर कैसे फल-फूल लायेगा और कैसे रंग-रूप निकालेगा। अभीतक उसने एक क्षण-भर के लिये भी इस पर ध्यान नहीं दिया था कि मेरे आगामी जीवन का क्या स्वरूप होगा। कभी सोचता कि प्रोफेसर हो जाऊँगा और खूब पुस्तकें लिखूँगा। कभी वकील बनने की भावना करता। कभी सोचता, यदि छात्रवृत्ति प्राप्त होगी तो सिविल सर्विस का उद्योग करुँगा किसी एक ओर मन नहीं टिकता था।

परन्तु प्रतापचन्द्र उन विद्यार्थियों में से न था, जिनका सारा उद्योग