पृष्ठ:वयं रक्षामः.djvu/२८२

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" सचमुच! सचमुच ! प्रिये , लक्ष्मण से कहो - उसे पकड़े । ” “ सौमित्र तो तीर्थशाला से लौटे हुए कुलपति की अभ्यर्थना करने आपकी आज्ञा से गए हैं । " " तो मैं ही जाता हूं -मेरा धनुष ला - बाण दे। " “ आर्यपुत्र , मैं क्या करूं ? " " इन महात्मा का सत्कार कर ! " ___ इतना कह राम धनुष पर बाण का सन्धान कर उस कांचनमृग के पीछे दौड़ पड़े । उन्हें दृष्टि से ओझल हुआ देख सीता ने कहा - “ अरे , बिना आर्यपुत्र के यहां अकेली को तो मुझे बड़ा भय लगने लगा, मैं तो कुटी में जाकर बैठती हूं । ” । उसे उठकर जाते देख रावण ने कठोर स्वर से कहा - “ सीते , ठहर! ठहर ! " " अरे ! तुम कौन हो ? " ___ “ सुन्दरी, तेरी कांति स्वर्ण के समान है, यह पीताम्बर तेरे स्वर्ण गात पर खूब खिल रहा है । तू नारी है, स्त्री है, कान्ति है, कीर्ति है , अप्सरा है अथवा स्वच्छन्द -विहारिणी रति है । तेरे नेत्र अति सुन्दर हैं और तेरी धवल दन्तावली मेरे मन को भा गई है । तेरे सौन्दर्य पर मैं मोहित हूं । तेरी यह पतली कमर तो गजब ढा रही है, तेरे स्तन भी कैसे चुस्त हैं ! तुझ जैसी नारी तो मैंने आज तक देखी ही नहीं । कहां तो तेरा यह देवदुर्लभ रूप , उभार और कोमल मृदुल गात्र और कहां यह दुर्गम वन , जहां पद - पद पर भय है। अरी तुझे तो मणि प्रासादों में , पुष्पों से सुरभित वाटिकाओं में , समृद्ध नगरों में रहना चाहिए । तू यहां हिंसक जन्तुओं से परिपूर्ण वन में कहां आ फंसी है? ” छद्मवेषी अतिथि से ऐसे अश्रुत वचन सुन भयभीत होकर सीता ने कहा - “ यह तो अतिथियों का सदाचार नहीं है। तुम कोई छद्मवेशी, दुराचारी, तस्कर तो नहीं हो ? " “ अरी, क्या तु नहीं जानती ? जिसने देवराट- सहित सब देव , यम , कुबेर और पृथ्वी के नृपतियों को जय करके त्रिविक्रम पद प्राप्त किया है, जिसके भय से सब देव , दैत्य , असुर , नाग , थर - थर कांपते हैं , मैं वही जगज्जयी रक्षेन्द्र रावण हूं , जिसकी बहन सूर्पनखा का तेरे इस वनवासी पति ने अंग - भंग किया है तथा जिसके चौदह सहस्र भटों को मार डाला है । " " क्या रावण? " " हूं, अब तू मेरे हाथ से बचकर कहां जाती है ? " वह उसे पकड़ने को आगे बढ़ा। सीता ने चीत्कार करके कहा - “ आर्यपुत्र, रक्षा करो ! सौमित्र, रक्षा करो ! " " अरी सुन , अब तू उस बहिष्कृत राजभ्रष्ट भिखारी राम का ध्यान छोड़ और मझी को आर्यपुत्र समझ । मैं तुझे अपनी रानियों में सर्वोपरि स्थान दूंगा । मेरी स्वर्ण लंका में जो समुद्र के मध्य में बसी है तथा जिसकी अतुलनीय शोभा त्रिलोकविश्रुत है - चलकर मेरे स्वर्णिम प्रासादों में तू रह । वहां मेरे अन्त: पुर की सैकड़ों दासियां तेरी सेवा करेंगी और तू यथेष्ट सुख- भोग करेगी। " सीता ने यह सुनकर क्रोध से कहा, “ अरे पतित , कुटिल , चोर , तेरा सर्वनाश उपस्थित है। जब तक आर्यपुत्र नहीं आते हैं , तू यहां से भाग जा । " " तो अब तो तुझे लेकर ही जाऊंगा। ” इतना कह उसने आगे बढ़कर सीता को