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लेखाज्जलि


है कि एक तो उनकी संख्या अधिक है, दूसरे वे छोटे-छोटे जंगलों, नदी-नालों के कछारों तथा और भी कुछ जगहोंमें रह सकते हैं। और, देहातियों के पास बन्दूकें न होनेसे उनका नाश भी बहुत ही कम होता है। तथापि वे भी कम ही होते चले जा रहे हैं, क्योंकि सरकार ने उनको मारनेवालों के लिए इनाम मुकर्रर कर दिये हैं।

जिस समय रेल और तारका अस्तित्व न था तथा सड़कें भी कम थीं उस समय रीछ और भेड़िये प्रायः सभी कहीं बहुत अधिक संख्यामें पाये जाते थे। रीछ तो उतने न थे, पर भेड़िये बहुत अधिक थे। वे कुत्तों, बकरियों, भेड़ों और गाय-भैंसों के बदोंपर दिन-दहाड़े छापा मारते और उन्हें उठा ले जाते थे। यहांतक कि देहात में यदा कदा वे छोटे-छोटे लड़कों और लड़कियों को भी उठा ले जाते और उन्हें मार खाते थे। इस प्रकार की दुर्घटनायें अब भी कभी-कभी हो जाती हैं। भेड़ियों के सम्बन्धमें एक बड़ी ही विचित्र बात सुनी जाती है। सुनी क्या जाती है उसके सच होने के कितने ही प्रमाण भी मिले और पुस्तकों तकमें लिखे जा चुके हैं। वह यह कि भेड़िये जिन बच्चों को उठा ले जाते हैं उन्हें वे कभी-कभी मारते नहीं, किन्तु अपनी माँद में पालते हैं। कोई सौ वर्ष पहले इस देश में भ्रमण करनेवाले कई अंगरेज़ अफ़सरों ने इन घटनाओंका आँखों देखा वर्णन अपनी पुस्तकों में किया है।

जिस समय अवध प्रान्त में लखनऊ के नवाब-वज़ीरों का राज्य था उस समय स्लीमन नाम के एक साहब लखनऊ में रेज़िडेंट थे। उन्होंने अपने समयमें इस सूबे की देहात में दूर-दूरतक दौरा किया था। अपने