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[आठवां
लवङ्गलता।


नज़ीर,—"लेकिन, हज़त! उस वक्त हुजूर ने नव्वाब की तस्वीर के साथ जैसा सलूक किया था, उसे देख गुलाम की कब हिम्मत होसकती थी कि हुजूर के रूबरू लब खोलता, या नव्वाब का ख़त हुजूर की ख़िदमत में पेश करता "

लवग॰,—"यह कोई माकूल उज़ नही है! जब कि मैं नव्वाब को चाहती हूं तो मुझे पूरा अख्तियार इस बात का है कि नव्वाब की तस्वीर की तो बात ही क्या, खुद नव्वाब के साथ जैसा चाहूं, सलूक कर सकती हूं, इसलिए तुम्हे मुनासिब था कि तुम उसी वक्त अपना मतलब तुझपर ज़ाहिर कर देते और नवाब का ख़त मेरे सामने रखते।"

नज़ीर,—"खैर कुसूर हुआ, इसे हुज़र मुआफ़ करें।"

निदान, फिर तो लवगलता ने नजीर खां से काग़ज़, कलम, दावात लेकर उन बीसों आदमियों के नाम लिख लिए, जो उस समय वहां पर मौजूद थे। इसके बाद डेरा कूच हुआ। अब लवंगलता अपनी गाड़ी में अकेली सफ़र करने लगी और नजोरखा वगैरह दूसरी गाड़ियों और घोड़ो पर सवार हो, बड़ी चौकसी के साथ लवंगलता की गाड़ी को घेरकर चलने लगे। चलने के समय वही मार्ग में लवंगलता ने अपने कंगन में एक पुर्जा लपेट कर डाल दिया था। योही तीन दिन तक वे लोग बराबर चले गए और चौथे दिन पहर रात जाते जाते लवंगलता नव्वाब सिराजुद्दौला के 'हीराझील' नामक प्रासाद में पहुंचा दीगई।