पृष्ठ:लखनऊ की कब्र (भाग २).djvu/४०

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  • लखनऊ की कत्र

पांचवां परिच्छेद । मैंने होश में आकर देखा कि जिस कोटरी में मैं इस मायः कैद किया गया हूं; वह आठ हाध लंबी चौडी अंदाजन उतनी हो ऊंची पत्थरों से बनी हुई है। गो, यह कोठरी उतनी गंदी न थी: जिस में आसमानी ने मुझे पेश्तर कैद किया था, लेकिन तौभी यह सिवा कैदियों के रखने के और किसी मसरफ की न थी। इस में सिर्फ एक खरहरी चारपाई बिछी हुई थी, एक ताकपर धधला चिराग जलरहा था, एक तरफ पानी की सुराही, कूजे और कई रोटियां रक्खी हुई थीं और दीवार की ऊंचाई पर छोटे २ कई ताक इस किस्म के बने हुए थे, जिनसे होकर साफ़ हवा आती और गंदो निकल जाती थी। उस कोठरी में चारों तरफ़ एक एक दरवाजे थे जिन में से एक बाहर से मन्द था. दो में बड़े मोटे २ लोहे के छड लगे हुए थे, और उन के बाद बाहरी तरफ़ से किवाड़ बन्द थे. और चौथी तरफ़ एक बहुतही छोटी और कोठरी थी. जो ज़रूरी कामों के ख़याल से बनाई गई थी. लेकिन बह (छोटी कोठरी) भीतर से तीनों तरफ़ से बिलकुल बन्द थी। यही शायद सात नंम्बर वाली कोठरी थी। गरज़ यह कि इस काल में आकर.जिसकी बानी मुवानी ओलमांनी ही थी. मुझे कुछ ज़ियादह तकलीफ न हुई. क्योकि कई महीने से लगातार शाहीमहलसरा के अन्दर कैद रहने के सपब मुझे तकलीफ़ बर्दाश्त करने की आदत पड़ गई थी. लेकिन आसमानी कबरा से मुझे कोई भलाई की उम्मीद न थी ओर मैंने दिलही दिल में या समझ लिया कि अगर खुदा इस मर्तवः नी मुझे उसके हाथ से न बचाएगा तो अजब नहीं कि वह मेरे साथ बहुत बुरी तरह से पेरा आएगी __मैं चारपाई पर बैठा इन्हों बातों को सोच रहा था. इतनेही में एक तरफ के जंगलेके पार वाला दरवाजा खुला जिलकी आहट पाकर मैंने उस ताफ़ देखा तो क्या देखा कि हाथमैं चिराग लिए हुए