पृष्ठ:लखनऊ की कब्र (भाग २).djvu/३७

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  • शाहीमहलसरा मादान रहा कि तुम्हारे यहां रहने पर उसकी जानमुफ्त जायगी और तुम्हारी भी; लेकिन इस वक्त तुत्र अगर यहां से टल जाओ तो तुम भी वेदाग बच सकते है। और वह भी ।"

मैंने कहा,-- इन फ़ज़ल बातों के लिए सिर खाली करने की में कोई जरूरत नहीं समझता और यही विहतर समझता हूं कि जन तक उस परी से मुलाकात न हो. यहां से मुझे कहीं न जाना चाहिए. चाई इसका नतीजा कुछ ही क्यों न हो! " मैंने जो कुछ लेखा था- आखिर वही हुआ ! यानी मेरी बात सुन कर वह नकाबपोश औरत बेतरह चिढ़ गई और कड़क कर बाली.-- जान पड़ता है कि मौत तुम्हारी दामनगी हुई है. यही वजह है कि इस वक्त तुम्हें अपना ना नुकसान नहीं सूझता है; पल.' ऐसी हालत में में तुम्हारी और उस (अपनी दोस्त) औरत की चिहतरी के लिये जा कुछ मुनासिव समगी करूगी। मैंने कहा- क्या करोगी?" उसने कहा.--« यही कि अगर तुम राज़ी से न जाना चाहोगे ते जबरदस्ती मैं तुम्हें शाहीमहललरा के बाहर निकाल दुगी । . मैंने कहा--" अगर मैं यहां से न जाना चाहूं तो तुम क्यों कर मझ निकाल सकोगो ? क्या मैं दूध पीता बचा हूं कि तुम सझे गोदी में उठा कर यहांसे ले जा सकोगी ?" उसने कड़ककर कहा.--.' झपनी सहेली के खातिर मुझ से जो कुछ बन पड़ेगा. उसे मैं उठा न रक्खूगी और जिस तरह हो सकेगा- तुम्हें यहां से निकाल बाहर करूंगी। बस अब आखिरी सवाल मेरा यह है कि तुम खुशी से जाओगे या नहीं?" ___ मैंने कहा.-- यह सवाल तुम्हारा बिल्कुल बे बुनियाद है और इसका यही जवाब है कि मैं यहां से हर्गिज न जोऊगा!" शौर, तो देखो। यों कहकर उसने जोर से सीटी बजाई. जिE की आवाज सुनते ही चारपाई के नीचे से एक कद्दावर हवशी जवान