पृष्ठ:राष्ट्रीयता और समाजवाद.djvu/४२

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भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलनका इतिहास २६ आदेश दिया गया कि वे अपने-अपने प्रान्तमे स्वयसेवकोका सगठन करे । ३१ मार्च और १ अप्रैल १९२१को अखिलभारतवीय काग्रेस-कमेटीकी जो वैठक वेजवाड़ामे हुई थी उसने अागामी ३० जूनतक 'तिलक स्वराज्य फण्ड'के लिए एक करोड़ रुपया एकत्र करने, एक करोड़ काग्रेसके सदस्य बनाने और कम-से-कम वीस लाख चोंके चालू करानेका निश्चय किया। इस कार्यक्रमको वहुत अंशोमे पूराकर काग्रेसने अपनी सम्पूर्ण शक्तिको विदेशी वस्त्रके बहिष्कार एव खादीके प्रचारमे लगा दिया। ५ नवम्बर १९२१को अखिल भारतवीय काग्रेस-कमेटीने प्रान्तोको अपनी जिम्मेदारीपर अपनी इच्छाके अनुसार किसी रूपमे सत्याग्रह प्रारम्भ करनेका अधिकार कुछ शर्तोके साथ दे दिया। असहयोग आन्दोलन लोक-प्रिय हो गया और काग्रेसकी वढती हुई शक्तिको देखकर सरकार व्याकुल हो उठी। इस अपूर्व जागृतिके कई कारण थे । जलियाँवाला बागके हत्याकाण्डके कारण सरकारकी न्याय-प्रियतापरसे लोगोका विश्वास उठ गया था। हिन्दुस्तानके मुसलमान भी इस समय सरकारसे बहुत अप्रसन्न थे। युद्धके समय उनके साथ जो वादे किये गये थे सरकारने उनमेसे एकका भी लिहाज नहीं किया । केवल तुर्कीका साम्राज्य ही छिन्न- भिन्न नही कर दिया गया था, किन्तु कई मुस्लिम देशोपर ब्रिटिश सरकार अपने नियन्त्रणको सुदृढ करने एवं अपने अधिकारोका विस्तार करनेकी चेप्टा कर रही थी। अरव उसके नियन्त्रणमे था। इराक और पेलेस्टाइनपर राष्ट्र-सघकी अोरसे उसको शासनका अधिकार (मेण्डेट) मिल चुका था। रूसके फारससे अलग हो जानेके कारण इङ्गलैण्ड सारे फारसपर अपना अधिकार जमाना चाहता था । इसके अतिरिक्त नवम्बर १९१७मे रूसमे जो क्रान्ति हुई थी उसका समस्त एशियापर प्रभाव पडा । इस क्रान्तिके फल- स्वरूप रूसमे एक नवीन शासन-पद्धतिका उपक्रम हुआ । रूसको राज्यक्रान्तिका प्रमुख नेता लेनिन था। वह पूंजीवादका कट्टर विरोधी था और शासन-यन्त्रपर श्रम-जोवियोका आधिपत्य कायम करना चाहता था। उसने अपने देशमे एक नवीन समाजकी प्रतिष्ठा की। यूरोपके पूँजीवादी राष्ट्रोने बोलणेविक रूसका विरोध किया और दुनियामे उसको वदनाम करनेको हर तरहसे कोशिश की। उन्होने रूससे हर तरहका सम्वन्ध हटा लिया और उसके विरोधियोको हर तरहसे सहायता की । १९२०मे चोलशेविक रूसको अपने प्रतिपक्षियोपर विजय मिली और अवसर पाकर लेनिनने साम्राज्यवादका विरोध करनेके लिए एशियाके देशोके साथ सोवियत-सरकारका व्यापारिक एवम् राजनीतिक सम्बन्ध स्थापित किया । एशिया और अफ्रीकाके राष्ट्रीय अान्दोलनोकी सहायता करना रूसने अपना कर्तव्य समझा, क्योकि इन्ही महाद्वीपोके विविध देशोके आर्थिक जीवनपर प्रभुत्व पाकर यूरोपके पूंजीवादी राष्ट्रोने अपनी शक्तिको वढाया था। उसने बुखारा, चीन, फारस, तुर्की और अफगानिस्तानके साथ १६२१मे सन्धियाँ कर मित्रता स्थापित की। जो अधिकार जारके शासनकालमे एशियाके विविध देशोमे रूसको प्राप्त थे उनका उसने अपनी इच्छासे परित्याग कर दिया । इसका एशियावासियोपर बहुत अच्छा प्रभाव पड़ा। उसने न केवल एशियाके राष्ट्रोकी स्वतन्त्रताको ही स्वीकार किया प्रत्युत उनकी स्वतन्त्रताकी रक्षा करनेका भी वचन दिया । साम्राज्यवादका विरोध करनेके लिए