पृष्ठ:राष्ट्रीयता और समाजवाद.djvu/३५७

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३४२ राष्ट्रीयता और समाजवाद शिक्षाकालका उनको अच्छे-से-अच्छा उपयोग करना चाहिये, चरित्नगठन और शरीर- सम्पत्तिके साथ-साथ अपने देशको वर्तमान समस्यायोका अध्ययन करना चाहिये तथा जनताके निकट सम्पर्कमे आना चाहिये । आजकी समस्याएँ नवीन है और जनताकी अभिलापागो और आवश्यकताओंको जाने बिना कोई भी कुशल शासक नही हो सकता । राष्ट्रके उत्थानके लिए विपुल सख्यामे विद्याचरण-सम्पन्न स्त्री-पुरुप चाहिये जो विविध कार्योमे निपुण हो और जिन्होने सेवाका व्रत लिया हो। एक प्रश्न हमारे सम्मुख यह है कि किस प्रकार उन निर्धन विद्यार्थियोके लिए उच्च शिक्षा सुलभ कर सकते है जिनमे प्रतिभा है और जो उसके अधिकारी सिद्ध हो चुके है । उच्च शिक्षाको गरीब-अमीर सबके लिए सुलभ होना चाहिये । यह ठीक है कि सभी विद्यार्थी युनिवर्सिटी शिक्षाके अधिकारी नही है । अनुत्तीर्ण विद्यार्थियोकी बडी संख्या इसका प्रमाण है। किन्तु इसका कारण है कि विविध शिल्पकी शिक्षा प्रदान करनेकी समुचित व्यवस्था अवतक नहीं हो पायी है । जब ऐसी व्यवस्था हो जायेगी और जीविकाके विविध द्वार खुल जायेंगे तब स्वत. ही सब विद्यार्थी युनिवर्सिटीमे प्रवेश न लेगे। किन्तु वे विद्यार्थी जो उसके अधिकारी है उससे क्यो वञ्चित रखे जायँ केवल इसलिए कि उनके पास साधनोकी कमी है। ऐसे विद्यार्थियोकी शिक्षा केवल निशुल्क ही न होनी चाहिये वरन् उनके भरण-पोपणका भार भी समाजको उठाना चाहिये । विलायतकी युनिवर्सिटियोमे ४१ प्रतिशत विद्यार्थियोको किसी न किसी रूपमे सहायता दी जाती है, किन्तु हमारे यहाँ ५ प्रतिशतसे अधिक विद्याथियोको नि शुल्क शिक्षा नहीं दी जाती। इस अनुपातमे वृद्धि होनी चाहिये। यह तभी सम्भव है जब गवर्नमेण्टकी ग्राण्ट बढे और साथ-साथ विश्वविद्यालय अपनी वृद्धि आप करनेके उपाय सोचें । गवर्नमेण्टके सम्मुख अनेक काम है और उनमेंसे कई समान रूपसे आवश्यक है। उसकी आय भी सीमित है । अत. केन्द्रीय गवर्नमेण्टको युनिवर्सिटी-शिक्षाके लिए पर्याप्त धन देना चाहिये जिसमे गरीव विद्यार्थियोको भी पूरी सहायता दी जा सके तथा पोस्टग्रेजुएट-शिक्षा और गवेपणाका उचित प्रवन्ध किया जा सके । गरीव विद्यार्थियोकी सहायताके लिए हमारे प्रान्तके धनवान सज्जनोको पर्याप्त संख्यामे छात्रवृत्ति देनी चाहिये । विद्यादानसे बढकर कोई दान नहीं है और इसके पानेके सबसे बड़े अधिकारी वह प्रतिभावान विद्यार्थी है जो दरिद्रताके कारण अपनी शक्तियोके विकासका अवकाश नही पाते । प्रान्तके डिस्ट्रिक्ट बोर्ड और म्युनिसिपल बोर्डोको भी इस दिशामे कुछ करना चाहिये। उन्हें अपने जिले और शहरके उन विद्यार्थियोमेसे कुछको चुनकर छात्रवृति देनी चाहिये जो उसके पात्र है । मैने कुछ ऐसे प्रश्नोके ऊपर चर्चा है जो मुझे अत्यन्त आवश्यक मालूम पडे । किन्तु विश्वविद्यालयोको सफलता तभी मिल सकती है जब अध्यापकोका पुरस्कार ऐसा हो जिससे उनको सन्तोष हो और उनके चित्तकी एकाग्रता हो सके । आज वस्तुप्रोका मूल्य इतना बढ़ गया है कि लेक्चररका काम आजके वेतनमे किसी प्रकार नहीं चल सकता। अतः पुरस्कारमे उचित वृद्धि सव वर्गके अध्यापकोको हो जानी चाहिये। ऐसा होनेसे ही हमारे अध्यापक दत्तचित्त होकर शिक्षाका काम कर सकते है। उचित पुरस्कारके न