पृष्ठ:राष्ट्रीयता और समाजवाद.djvu/३०

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भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलनका इतिहास १७ बङ्गालके बड़े-बड़े नेता सम्मिलित हुए थे । एक जुलूस निकाला गया था। जुलूसके लिए कोई अाज्ञा नही ली गयी थी, पर राह चलतोको कोई तकलीफ न हो इस खयालसे आधी सडक खाली छोड दी गयी थी। पुलिसने जुलूसको तितर-बितर करनेके लिए जुलूसपर लाठी-प्रहार शुरू किया। किसीने बुजदिली नही दिखलायी। दृढताके साथ लोग इस प्रहारको सहन करते रहे । इस प्रकार सरकार उनका अपकर्प न कर सकी । पूर्वी वगालके कुछ जिलोमे अदालतोका भी वहिप्कार किया गया था और पचायते कायम कर. दी गयी थी। वगालके गरम दलके नेता 'बहिष्कार'का व्यापक अर्थ करते थे । वहिष्कारसे केवल विदेशी मालका बहिष्कार नही समझा जाता था । वहिष्कारका अर्थ था सरकारसे धीरे-धीरे अपना सम्बन्ध विच्छिन्न कर लेना। श्री विपिनचन्द्र पालने----जो उस समय राष्ट्रीयताके ऋपि समझे जाते थे-मद्रासके अपने एक व्याख्यानमे कहा था कि हम इस वातका प्रयत्न करेगे कि लोग धीरे-धीरे सरकारसे सहयोग करना छोड दे । उन्होने इसे स्वीकार किया कि यह सम्भव नहीं है कि सब लोग सरकारकी नौकरी छोड़ दे, पर बहिष्कारसे एक लाभ अवश्य होगा कि सरकारी नौकरोका आज जो असाधारण आदर और सम्मान है वह बहुत घट जायगा। उनका कहना था कि सरकारी नौकरोका सामाजिक वहिप्कार करके उनका प्रभुत्व नप्ट किया जा सकता है। पाल महाशय तो सरकारके मुकाबलेमे अपना स्वतन्त्र शासन-चक्र स्थापित करना चाहते थे। उनकी शिक्षा थी कि हमको गांवो और जिलोका सगठन करना चाहिये और अपने अन्दर शक्ति पैदा कर धीरे- धीरे उन सारी संस्थाओको स्थापित करना चाहिये जो आज सरकारद्वारा संचालित हो रही है। सरकारकी ओरसे दमन जोरोसे शुरू हो गया । आन्दोलनको दबानेके लिए कई नये कानून बनाये गये । १९०७ मे राजनीतिक सभाग्रोको रोकनेके लिए एक कानून बनाया गया। इसी वर्ष लाला लाजपतराय और सरदार अजीतसिहको १८१८ के रेगुलेशन ३ के अनुसार देश-निर्वासनका दण्ड दिया गया । इस दमनके कारण देशमे विप्लवकारियोका एक दल भी पैदा हो गया । कई राजनीतिक हत्याएँ हुई । इसलिए सरकारने कई और कानून बनाये । समितियोको वन्द करनेके लिए और पड्यन्त्रके मुकद्दमोमे सरसरी फैसला करनेके लिए १९०८ मे 'क्रिमिनल ला अमेण्डमेण्ट एक्ट' पास हुआ । जुलाई १९०८ मे लोकमान्य तिलकको ६ वर्ष कारावासका दण्ड मिला और वगालके नौ प्रसिद्ध नेता दिसम्बर मासमे निर्वासित कर दिये गये । १९१० मे 'प्रेस एक्ट' पास करके प्रेसकी स्वतन्त्रता छीन ली गयी। इसके पहले ही १९०७ मे सूरतकी काग्रेसके अवसरपर नरम और गरम दलके बीच झगडा हो गया था। गरम दल काग्रेससे अलग हो गया । १९१६ तक नरम दलका काग्रेसपर एकाधिकार रहा । लोकमान्य १९१४ मे जव माण्डले जेलसे छूटकर वापस आये तो उन्होने दलका फिरसे सगटन किया और श्रीमती एनी वेसेण्टके उद्योगसे १९१६मे दोनो दलोमे एकता हो गयी। लार्ड कर्जनके उत्तराधिकारी लार्ड मिण्टो इस वातको अच्छी तरह समझते थे कि भारतवासियोको और अधिकार दिये विना देशका असन्तोप दूर नही किया जा सकता। उन्होने १९०६ मे ही इस वातपर बहुत.जोर दिया था कि सरकारको अपनी इच्छासे स्वयं २