पृष्ठ:राष्ट्रीयता और समाजवाद.djvu/२९१

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२७६ राष्ट्रीयता और समाजवाद प्रकार कहा जा सकता है ? इसके अतिरिक्त इस समय भी समाजवादी व्यक्तिगत घृणाको दूर करनेका ही प्रयत्न करता है । उदाहरणके लिए अाज हम यह देखते है कि जब एक मजदूर अपने मालिकसे मजदूरीके लिए लड़ता है तव वह उसे घृणाकी दृष्टिसे देखता है, लेकिन समाजवादी मजदूरको यह बतलाता है कि अगर मजदूरको उचित मजदूरी नही मिलती तो इसमे दोप व्यक्तिगत रूपसे खास मालिकका नहीं है, बल्कि उस पूंजीवादी. प्रणालीका है जिसने उत्पादनके साधनोको मुट्ठीभर पूंजीपतियोंके हाथमें दे दिया है । अगर मजदूरवर्ग शोपण-सम्बन्धसे मुक्ति चाहता है तो उसे वह व्यक्तिगत रूपसे पूंजी- पतियोको हानि पहुंचानेकी भावनासे काम करके या मशीनोको तोड़-फोडकर नहीं, बल्कि पूंजीवादी उत्पादन प्रणालीको मिटाकर और मशीनोंपर शोपित वर्गोका कब्जा करके ही मिल सकती है। इसी प्रकार समाजवादी मजदूरोमे चलनेवाली प्रतिस्पर्धा और घृणाको दूर करनेका प्रयत्न करते है । बेकारी और गरीवीके इस युगमे हर मजदूर दूसरे मजदूरको वीजरूपमे ( potentially ) प्रतिद्वन्द्वी समझकर उससे घृणा करता है, किन्तु समाजवाद मजदूरोको यह बतलाता है कि वे अापसमे सहयोग करके और सगठित होकर ही शोषण-रहित समाजकी रचना कर सकते है । व्यक्तिगत घृणाको दूर करनेके लिए समाजवादियोको श्रेय मिलना चाहिये । समाजमे प्रचलित शोपण सम्बन्धके प्रति समाजवादी जरूर घृणा पैदा करता है और उसे वह उचित समझता है, क्योकि वर्तमान दुर्दशाके प्रति घृणा उत्पन्न करके ही हम व्यक्तिके मनमे उस दुर्दशाके प्रति विद्रोह पैदा कर सकते है। क्रान्ति क्या है ? ऊपर कहा गया है कि वर्ग-सघर्पके द्वारा ही अबतक समाज तरक्कीकी एक मंजिलसे दूसरी मजिलपर जाता रहा है । आर्थिक उत्पादनकी प्रणाली अपने विकासके क्रममे एक ऐसी अवस्थाको पहुँच जाती है कि उस ढाँचेके मातहत रहकर उत्पादनकी शक्तियाँ ( forces of production ) आगे उन्नति नही कर सकती ; उनका विकास रुकने लगता है-उत्पादन-सम्बन्धों और उत्पादक शक्तियोंका विरोध चरम सीमापर पहुँच जाता है । उस समय उत्पादक शक्तियोके विकासके लिए यह आवश्यक हो जाता है कि पुराना आर्थिक ढाँचा नष्ट किया जाय और एक नयी आर्थिक प्रणाली कायम की जाय जिसमे उत्पादक शक्तियोके ऊपरसे वे बन्धन उठ जायें जो कि उसके विकासको रोकते रहे है । पुरानी आर्थिक प्रणालीका नाश करके उसके स्थानपर एक नयी आर्थिक प्रणाली कायम करना एक ऐसी घटना है जो कि मामूली सुधारवाद ( reformism ) के रास्ते नही हो सकती । सुधारवादके जरिये किसी ढाँचेको तभीतक बदला जा सकता है जबतक ढाँचेकी बुनियादको कायम रखते हुए उसमे ऊपरी तब्दीलियाँ की जाती है । जब ढाँचेमे बुनियादी तब्दीलीका सवाल उठता है तब वे स्थिर स्वार्थवाले वर्ग जो यह देखते है कि उनकी सुविधाएँ बुनियादी तब्दीलीकी बदौलत खत्म होनेवाली है, अपने प्राणोकी वाजी लगाकर, अपनी सारी ताकतके साथ, इस प्रकारकी तब्दीलीकी मुखालिफत करते