पृष्ठ:राष्ट्रीयता और समाजवाद.djvu/१०३

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राष्ट्रीयता और समाजवाद इस अगको हम मध्यम श्रेणी कह सकते है । इस आवाजकी जडमें राजनीतिक भावना और जोश था और उसने शहरोमे रहनेवाली मध्यम श्रेणीकी जनताको खूब स्पर्श किया, परन्तु ग्रामोके रहनेवाले किसानो और मजदूरोतक वह अावाज नही पहुँची । इसके बाद काग्रेसमे गाधीयुग अाया। उसका प्रारम्भ हुआ सन् १९१९ के रोलट ऐक्टके विरोधसे । रौलट ऐक्टके विरोधमे जो आन्दोलन उठा उसका ढग ऐसा था कि वह जनताकी चीज बनने लगा। गाँव-गांव काग्रेसका प्रचार होने लगा और स्वराज्यकी मांग जनताके सम्मुख रखी गयी। किसानोसे वात करते समय, उनके सम्पर्कमें पानसे, उनके दृष्टिकोणसे भी वहुत-सी बाते कही गयी; परन्तु यह नान्दोलन भी वास्तविक अर्थोमे देशकी जनताका आन्दोलन न बन सका और इसकी वजह स्पष्ट थी कि जनताके रोजमर्राके जीवनसे इसका कोई सम्बन्ध न था । आर्थिक प्रश्नोंकी चर्चा कांग्रेसके मचसे सबसे प्रथम हमे सन् १९३० मे जनतासे सम्बन्ध रखनेवाले आर्थिक प्रश्नोकी चर्चा सुनायी देती है और यह चर्चा उठी महात्माजीद्वारा लार्ड इरविनके सम्मुख रखी गयी माँगोके रूपमे । यह मांग थी लगानको कमसे कम ५० फीसदी कम कर देनेकी । इस माँगका कारण यही था कि किसानोकी अावाज अव काग्रेसतक पाने लगी थी। आर्थिक प्रश्नोकी ओर काग्रेसका ध्यान इस समयसे बढ़ने लगता है। करांची काग्रेसमे और उसके बाद लखनऊ काग्रेसमे प० नेहरूने जनतासे सम्बन्ध रखनेवाले प्रश्नोको काग्रेसद्वारा हाथमे लेनेकी आवश्यकतापर जोर दिया। इसका कारण यह था कि इसके पहले बारडोली (गुजरात) और यू० पी० मे किसानोकी समस्या राजनीतिक क्षेत्रमे आकर हमारी राष्ट्रीय लडाईका मुख्य हथियार बन गयी थी । हमे यह समझना पड़ेगा कि याथिक प्रश्नोकी उपेक्षा करनेसे काग्रेसकी शक्ति जो उस समय बढ गयी थी, वैसी न वन पाती। इसके बाद काग्रेसी सरकारोका जमाना आता है। चुनावमे काग्रेसकी सफलताका श्रेय वहुत हदतक हमारे चुनावके मैनीफेस्टो या प्रतिज्ञापत्र को है । इस प्रतिज्ञा-पत्रद्वारा काग्रेसने जनताके आर्थिक जीवनमे सुधारोकी प्राशा दिलाकर उनके जीवनके विकासके मार्गमे आनेवाली रुकावटोको हटानेका अाश्वासन दिया। परिणाममे हम काग्रेसको किसानोके सम्बन्धमे कानून बनाते हुए देखते है, परन्तु इन फुटकर कानूनोसे कहाँतक सफलता हो सकती है ? यदि काग्रेसका उद्देश्य हमारे राष्ट्रको उसके जीवनके मार्गमे आनेवाली बाधायोसे मुक्त कर उसे वास्तवमे विकास और जीवनके पथकी ओर ले जाना है जिसमे कि देशकी जनता जीवनका अधिकार पा सके, तो यह काम कुछ राजनीतिक नारो 'स्लोगन्स' की माला जपनेसे पूर्ण नहीं हो सकता । 'पूर्ण स्वराज्य', 'साम्राज्यवादसे आजादी' इन सव नारोका तभी कुछ अर्थ हो सकता है जब हमारे सामने अपने समाजका ऐसा कोई रूप हो जिसमे जनता माथिक, सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्र में आत्मनिर्णयके अधिकारका