पृष्ठ:रामचंद्रिका सटीक.djvu/५३

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रामचन्द्रिका सटीक । कालदंडते कराल सब कालकालगावई । केशव त्रिलोक के विलोकि हारे भूप सब छोड़ि एक चंद्रचूड़ औरको चढ़ावई ॥ पन्नगप्रचंडपति प्रभुकी पनच पीन पर्वतारि पर्वतप्रभा न मान पावई ॥ विनायक एकहू पैाव न मिनाक ताहि कोमल कमलपाणि राम कैसे ल्यावई ३७ ।। यासों या जनायो कि इंद्रकी सहाय करत हैं ३३ राजनके राजा दशरथ के तनय पुत्र रामचन्द्र जैसे भूतलके चन्द्रमा बने हैं अर्थ राजनको राजा ऐसो तौ जाको पिता है आपु चन्द्रमा सरिस सबको सुखद हैं औ चांदनीसम यशप्रकाशक हैं याते बड़े भाग्यवान् हैं इति भावार्थः तैसे हे विदेह ! तुमहूं औ सीता हो अर्थ तुम राजन के राजा हौ औ सीना चकोरतनया सरिस शुभगीता हैं तो जाको तुमसों पिता है आप ऐसे यशको प्राप्त हैं तैसे सीताहू बड़ी भाग्यवती है इतिभावार्थः श्री चकोरी को औ चन्द्रही को प्रेम उचित है तैसे सीताको औ रामचन्द्रको है है इति व्यंग्यार्थः ३४ । ३५ इनको बल के निधान अर्थ वडेवलवान् सब जानत हैं औ विधान पाठ होइ तौ विधान कहे विधि जहां जा प्रकार चाहिये तहां ता प्रकार बल करवी ३६ या प्रकार जाको सत्रमाणी काल काल में कई समय समयमों गावत हैं अथवा काल जे यम हैं तिनहूं को काल नाराक! चन्द्रचूड़ महादेव प्रचंड जे पन्नग सर्पच के पतिहैं बड़े सर्प तिनहुँनके जे प्रभु वासुकी हैं तिनहीं की पीन कहे मोटी पनच रोदा है अथवा पन्नगयचंडपति जे वासुकी हैं तेई प्रथुकी महादेव की आशय यह और रोदा जाको बल नहीं सहिसकत श्री पर्वतारि इंद्र और जे पर्वतनके प्रभा सदृश हैं दैत्यादि ते जाके गरुआई के मान प्रमान को नहीं पावत औ एक कहे अकेले जो विनायक गणेशहू न्यायो चहैं तो नाहीं श्राइसकत ३७॥ मुनि-दोहा ॥ राम इत्यो मारीच ज्यहि अरु ताडुका सुबाहु ॥ लक्ष्मणको वह धनुषदै तुम पिनाकको जाहु ३८ जनक-त्रिभंगीछंद ॥ सिगरे नरनायक असुर विनायक राक्षसपति हिय हारिगये । काहू न उठायो थल न छुड़ायो पनच हैं