पृष्ठ:रामचंद्रिका सटीक.djvu/३३६

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३४० रामचन्द्रिका सटीक। छंद ॥ गुणगणप्रतिपालक रिपुकुलघालक बालकते रण- रंता । दशरथनृपको सुत मेरो सोदर लवणासुरको हंता॥ कोऊ दै मुनिसुत काकपक्षयुत सुनियत है जिन मारे । यहि जगतजालके करमकालके कुटिल भयानक भारे ६ ॥ कारुपक्ष जुलुफ - बालकते बालअवस्थाही सों.रणरंता कहे रण में रमत रह्यो है यह जो जगत् जाल कहे संसारसमूह है अथवा जगरूपी जाल फांस है औ काल कहे समय है तिनके जे कुटिल कहे टेढ़ेकर्म हैं ते भारे कहे अतिभयानक हैं या जगत्में समयके फेरसों ऐसी अनुचित बात हैजाति है जाको देखिकै बड़ो भय होनहै इत्यर्थः ॥ मरहट्टाछंद || लक्ष्मण शुभलक्षण वुद्धिविचक्षण लेहु वाजिकर शोधु । मुनिशिशु जनि मारहु बंधु उधारहु क्रोधन करहु प्रबोधु ॥ बहुसहित दक्षिणा दै प्रदक्षिणा चल्यो परम- रणधीर । देख्यो मुनि बालक सोदर उपज्यो करुणा अद्भुत वीर १० कुश-दोधकछंद । लक्ष्मणको दल दीरघ देख्यो। कालसुते अतिभीम विशेख्यो ॥ दोमें कहौ सो कहा लव कीजै । श्रायुध लेहो कि घोटक दीजै ११ ॥ प्रबोध क्षमा मुनि वालझनको लघु वेष देखि करणारग भयो औ सोदर शत्रुघ्नको मूञ्छित देखि आश्चर्य भयो कि एतो बड़ो वीर ताको बालकन यूञ्चित करयो शत्रुलको मूर्धिन करयो है तासों इनको मारो चाहिये यासों वीररस भयो १० ॥ ११ ॥ लव ।। बूझतहो तो यहै प्रभु कीजै । मोअसु दै बरु अश्व न दीजै । लक्षाण को दल सिंधु निहारो। ताकहँ बाण अगस्त्य तिहारो १२ कौन यहै घटिहै अरि घेरे । नाहिंन हाथ शरासन मेरे ॥ नेकु जहीं दुचितो चित कीन्हों । सूर बड़ो इषुधी धनु दीन्हों १३ लै धनुबाण बली तब धायो । पल्लव ज्यों दुल मारि उड़ायो । यों दोउ सोदर सेन सहाएँ ।