मेरे जीवन-मरण की कठिन समस्या उपस्थित होगई। इसलिए इस समय की गुरुतर चिन्ता का वर्णन करना वृथा
होगा। बहुत देर तक सोचते सोचते मैंने एक युक्ति निकाली।
सान के नीचे एक पहिया और एक रस्सी लगा कर मैंने पैर
के बल से सान चलाने की व्यवस्था की। मेरे पास जितने
हथियार थे, सब पर मैंने दो दिन में सान चढ़ा दी।
मैंने देखा कि मेरे खाने-पीने की चीज़ें बहुत कम रह गई हैं, तब मैं प्रतिदिन एक बिस्कुट खाकर ही दिन काटने लगा। इससे मन में बड़ी चिन्ता हुई।
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भग्न जहाज का पूनर्दर्शन
पहली मई--सबेरे उठ कर मैंने ज्यों ही समुद्र की ओर देखा त्यों हीं भाटे में एक जगह पीपे के सदृश केई वस्तु देख पड़ी। मैंने कुतूहलवश पास जाकर देखा तो एक बारूद का पीपा था और टूटे जहाज़ के दो तीन टुकड़े थे। बारूद में पानी पड़ने से वह पत्थर की तरह सख़्त होगई थी। तो भी मैं बारूद के पीपे को लुढ़का कर ज़मीन पर ले आया। मुझे ऐसा प्रतीत हुआ मानो एक जहाज़ पानी से कुछ ऊपर उठ आया हो। मैं बालू पर होकर जहाज़ की ओर अग्रसर हुआ।
समीप में जाकर देखा तो जहाज़ का पिछला हिस्सा बालू को ठेल कर कुछ ऊपर चढ़ आया था। जहाज़ तक जाने में मुझे पाव मील रास्ता पानी में तय करना पड़ा। अभी भाटे का समय था, अतएव मैं नीचे ही की राह से जहाज तक गया। जहाज़ को देख कर मैं पहले बहुत अचम्भे में आगया। फिर