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क्रूसो का कि़ला ।


आने की व्यवस्था की । इस प्रकार किले की रचना करके मैं खूब निश्चिन्त हो कर रात में खाने लगा । किन्तु बाद को मैंने समझा, इस टापू में मेरा कोई दुश्मन नहीं है । मेरी इतनी सावधानी निरर्थक हुई । इस क़िले के भीतर मैंने अपनी वस्तुओं को पहली जगह से बड़े परिश्रम के साथ ढो ढो कर ला रक्खा । उस प्रदेश में वर्षा बहुत होती थी, इस कारण मैंने दोहरा तम्बू अर्थात् एक के भीतर और एक तम्बू खड़ा किया और ऊपर के तम्बू को तिरपाल से ढँक दिया ।

बहुत दिनों तक मैं बड़े परिश्रम से ये सब काम कर ही रहा था, कि एक दिन काली घटा घिर आई । सारा आकाश-मण्डल काले बादलों से भर गया और इसके साथ ही पानी बरसने लगा । बिजली कड़कने लगी । बिजली की चमक की तरह मेरे हृदय में धक से एक बात याद हो आई, मेरी बारूद ! यदि उसमें आग लग जाय तब तो सर्वनाश हो जायगा । मेरी आत्मरक्षा और आहार-संग्रह करने का उपाय एक दम नष्ट हो जायगा । बारूद में आग लग जाने से अन्यान्य वस्तुओं के साथ मैं भी उड़ जा सकता था--यह चिन्ता पहले मेरे मन में न थी । क्योंकि बारूद से उड़ जाने पर मैं किस तरह, कब मर जाता, यह जानने का अवसर ही न मिलता तो फिर मृत्यु से डरता ही क्यों ?

वृष्टि बन्द होने पर, बारूद रखने के लिए, मैं छोटी छोटी थैलियाँ और बक्स बनाने लगा । बारूद के बक्स अलग अलग रक्खे जायेंगे तो एक लाभ होगा । वह यह कि यदि आग लगेगी भी तो सब एक साथ न जलेंगे । यह सोच कर मैं उसी की व्यवस्था करने लगा । मेरे पास प्रायः तीन मन