पृष्ठ:राबिन्सन-क्रूसो.djvu/७५

यह पृष्ठ जाँच लिया गया है।
६२
राबिन्सन क्रूसो ।

घूमते घूमते एक पहाड़ की तलहटी में मुझे समतल भूमि मिली । वहाँ हर तरह का सुभीता देख पड़ा । इस स्थान की बगल में पहाड़ इतना बड़ा था कि कोई प्राणी उस तरफ़ से उतर कर मुझ पर आक्रमण न कर सकता था ।

पहाड़ में एक जगह गुफा की तरह खुदा था, किन्तु वह असली गुफ़ा न थी । एक प्रकार का गड्ढा था ।

मैंने उसी तृणसंकुल हरित-भूमि में पर्वतस्थित खोह के समीप तम्बू खड़ा करने का विचार किया ।

खोह के सामने दस गज हट कर बीस गज व्यास में मैंने धनुषाकार एक अर्धवृत्त का चिह्न अंकित किया । इस अर्धवृत के ऊपर मैंने खूँटे गाड़ कर एक घेरा डाला ; प्रथम पंक्ति के पीछे छः इंच दूरी पर फिर एक पंक्ति-बद्ध खूँटों का घेरा बनाया । खूँटों को मैंने खूब मजबूती के साथ गाड़ा था, और खूँटों का सिरा अच्छी तरह बल्लम की तरह पैना कर एकसा कर दिया था । जंगल से खूँटों के उपयुक्त लकड़ी काट कर लाने और उसके सिरे छील कर गाड़ने में मेरा बहुत समय लगा और परिश्रम तो करना ही पड़ा । खूँटे गड़ जाने पर दो पंक्ति-बद्ध खूँटों के बीच की जगह को जहाज की रस्सी से उनकी ऊँचाई के बराबर भर दिया । उसके बाद भीतर से खूँटों की सहायता के लिए तिरछी मेखें गाड़ दीं । यह घेरा ऐसा सुदृढ़ हुआ कि किसी मनुष्य या हिंस्त्र पशु के मुझ पर आक्रमण करने की सम्भावना न रही ।

इस घेरे के भीतर जाने-आने के लिए मैंने कोई दर्वाजा न रक्खा । एक छोटी सीढ़ी के द्वारा घेरे के लाँघ कर जाने-