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क्रूसो का स्थलमार्ग से स्वदेश को लौटना।


कारी को पकड़ कर भेज दिया तब तो अच्छा ही है, नहीं तो सबके सब मारे जाओगे। यह खबर सुन कर हम लोगों के दल में खलबली मच गई। सभी लोग परस्पर एक दूसरे का मुँह देखने लगे। दल में किसने ऐसा काम किया है? किसके चेहरे पर अपराध का चिह्न झलकता है? यह कौन जान सकता है?

हम लोगों के सर्दार ने कहला भेजा कि हमारे दल में किसीने ऐसा काम नहीं किया। इस बात से वे लोग सन्तुष्ट न होकर आक्रमण का उद्योग करने लगे।

हमारे दल का एक आदमी, रूस के शासनकर्ता के दूत का स्वाँग धारण कर, क्रुद्ध ग्रामवासियों के पास जाकर बोला-असली अपराधी का पता लग गया। वह पीछे की ओर भाग गया है।

उसकी बात पर विश्वास करके ग्रामवासी पीछे की ओर दौड़ पड़े। हम लोग झगड़े से बच कर आगे बढ़ चले।

रास्ते में एक लम्बा चौड़ा बालू का मैदान मिला। उसके पार होने में पूरे तेईस दिन लगे। इस मरुभूमि में पेड़-पौधे, और पानी कहीं कुछ नहीं था। गाड़ी पर पानी लाद लिया गया था। इसीसे लोगों के प्राण बचे।

हम लोग क्रमशः यूरोप के निकटवर्ती होने लगे। इन देशों में भी कितने ही लोग देखने में आये। पर सभ्यता उन लोगों में भी न थी। वे लोग भी मूर्तिपूजक थे, चमड़े की पोशाक पहनते थे। पोशाक देखकर कोई नहीं समझ सकता था कि उनमें कौन पुरुष है और कौन स्त्री। स्त्रियों के चेहरे पर ज़रा भी लावण्य था कोमलता नहीं झलकती थी। देश जब बर्फ से ढक जाता था तब ये लोग मिट्टी के नीचे गुफा बनाकर रहते थे।