पृष्ठ:राजस्थान का इतिहास भाग 1.djvu/३२९

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कोलूमठ का सोलंकी राजा सिहाजी की इस विजय को सुनकर वहुत प्रसन्न हुआ। उसने सिहाजी के साथ अपनी बहन का विवाह कर दिया। सिहाजी कुछ दिनों तक यहाँ रहा। उसके बाद वह द्वारिका की तरफ रवाना हुआ। रास्ते में अनहिलवाड़ा पट्टन उसे मिला। अपनी थकान को मिटाने के लिये उसने उस नगर में रुकने का इरादा किया। वहाँ के राजा को जव यह मालूम हुआ तो उसने बड़े आदर-सत्कार के साथ सिहाजी का स्वागत किया। वहाँ पर कुछ दिनों तक सिहाजी ने विश्राम किया। सिहाजी जिन दिनों में अनहिलवाड़ा पट्टन में था, उसने सुना कि यहाँ पर लाखा फूलाणी का आक्रमण होने वाला है। इस आक्रमण के समाचार को सुनकर पट्टन का राजा बहुत भयभीत हो गया। सिहाजी ने उसके भय को दूर किया और लाखा फूलाणी के साथ उसने फिर युद्ध करने का निश्चय किया ।समय पर दोनों तरफ के आदमियों का सामना हुआ और लाखा के साथ सिहाजी की मारकाट आरम्भ हो गयी। इस लड़ाई के अन्त में लाखा मारा गया। उसके सिर के दो टुकड़े होकर जमीन पर गिरे। पट्टन की सेना के जयघोष से आकाश गूंज उठा ।लाखा के अत्याचारों से लोग बहुत दिनों से पीड़ित हो रहे थे। सिहाजी द्वारा उसके मारे जाने का समाचार सुनकर अनहिलवाड़ा पट्टन के स्त्री-पुरुषों को बड़ी प्रसन्नता हुई। लाखा का आतंक जहाँ तक फैला हुआ था, सभी लोगों ने सिहाजी की प्रशंसा की। सिहाजी तीर्थ यात्रा करने के लिये कोलूमठ से रवाना हुआ। अनहिलवाड़ा पट्टन में लाखा को मारकर उसने विजय की ख्याति प्राप्त की। इसके पश्चात् वह तीर्थ यात्रा के लिये गया अथवा नहीं, इसका उल्लेख भट्ट ग्रन्थों में कुछ नहीं मिलता। उनमें जो कुछ लिखा है, उससे प्रकट होता है कि सिहाजी अनहिलवाड़ा पट्टन से विदा होकर लूनी नदी के किनारे चला गया और वहाँ पर उसने कुछ दिनों तक निवास किया। वहाँ पर महवा नाम का एक नगर था। उस पर दावी वंश के क्षत्रियों का शासन था ।1 सिहाजी ने वहाँ के राजा को मार कर नगर पर अपना अधिकार कर लिया। कई स्थानों की लगातार विजय से सिहाजी के हृदय में राज्य का प्रलोभन बढ़ने लगा। इन्हीं दिनों में उसने खेरधर पर आक्रमण किया। वहाँ पर गोहिलों का प्रभुत्व था। गोहिल राजा महेशदास ने सिहाजी का सामना किया। वह युद्ध में मारा गया और गोहिल लोग युद्ध क्षेत्र से चले गये। सिहाजी ने उसके बाद खेरधर पर भी अपना अधिकार कर लिया। यहाँ पर पाली नगर में कुछ पालीवाल ब्राहमण रहते थे। उनके अधिकार में बहुत बड़ी भूमि थी। उन ब्राह्मणों पर मेर और मीणा जाति के पहाड़ी लोगों के अक्सर आक्रमण होते रहते थे और वे लोग लूट मार करके ब्राह्मणों पर अनेक प्रकार के अत्याचार करते थे। उनके आतंक से पाली नगर के ब्राह्मण सदा भयभीत रहा करते थे। इन दिनों में उन ब्राह्मणों ने पराक्रमी सिहाजी की विजय के लगातार समाचार सुने। वे लोग सिहाजी के पास गये और पहाड़ी जातियों के अत्याचारों को दूर करने के लिये उन्होंने सिहाजी से प्रार्थना की। सिहाजी ने उनकी प्रार्थना को स्वीकार कर लिया और पहाड़ी जातियों पर आक्रमण करके उसने पाली के ब्राह्मणों को निर्भीक बना दिया। जंगली जातियों के आक्रमण का भय कुछ दिनों के लिये पाली के ब्राह्मणों के मन से निकल गया। परन्तु उनको इस बात का सन्देह होने लगा कि सिहानी के चले जाने के बाद दावी राजस्थान के छत्तीस राजवंशों में एक है। मैंने इन स्थानों की यात्रा की है और कैम्बे की खाड़ी में भावनगर के गोहिलों से मैं मिला था। उनके इतिहास के सम्बन्ध में मैंने उनसे बातें की थीं। 1. 375