पृष्ठ:राजस्थान का इतिहास भाग 1.djvu/२८०

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करते । इस समय राणा के सामने भयंकर संकट था। राज्य के लगभग सभी सरदार शत्रु से मिल गये थे। सिंधी सेना के अतिरिक्त दूसरा कोई भी राणा की सहायता करने वाला न था। लेकिन वह सिंधी सेना भी राणा से विद्रोह कर रही थी। राणा और मेवाड़ राज्य की दुरवस्था देखकर सिंधी सेना अपने वेतन के सम्बन्ध में निराश हो रही थी और किसी प्रकार लड़-झगड़कर वह राणा से अपना वेतन वसूल करना चाहती थी। राणा के पास धन का अभाव था। वेतन न दे सकने के कारण कई मौकों पर सिंधी सेना के द्वारा उसको अपना अपमान सहन करना पड़ा। वह अब अपनी रक्षा करने में निराश और असहाय हो रहा था। जिस सिंधी सेना का उसको कुछ बल-भरोसा था, उसका विद्रोह बढ़ता जा रहा था। इस निराश अवस्था के समय राणा को अपने और राज्य की रक्षा का कोई उपाय सूझ न पड़ा। रघुदेव नाम का एक व्यक्ति उसका दूध भाई था।1 वह झाला सरदार का उत्तराधिकारी होकर उसके मंत्री का कार्य कर रहा था। इस संकट के समय उसने राणा को सलाह दी कि “आप उदयपुर छोड़ कर मंडलगढ़ चले जायें।” राणा को इस सलाह पर संतोष न हुआ। उसने सालुम्बर सरदार से परामर्श किया और उसने राणा को अमरचंद को बुलाने की सलाह दी । बुलाये जाने पर अमरचंद ने आकर कहा "इस समय राज्य के सामने भीषण संकट है। इन संकटों का सामना करने के लिए मैं सहज ही साहस नहीं करता । यह बात जरूर है कि आज के पहले भी अनेक मौकों पर मेवाड को भयानक संकटों का सामना करना पड़ा है और उन दिनों में मुझे सफलता मिली है। लेकिन आज की परिस्थितियाँ पहले की अपेक्षा बहुत भिन्न हैं। मेरे स्वभाव में भी एक दोष है और वह यह है कि मैं जो सही समझता हूँ, वही करता हूँ। किसी के अयोग्य परामर्श अथवा आदेश का मैं पालन नहीं कर पाता । मैं अपने इस अपराध को स्वयं स्वीकार करता हूँ ! मेवाड़ राज्य में इस समय धन का अभाव है। सरदार शत्रुओं से मिल गये हैं। सेना विद्रोह कर रही है। राज्य के सामने खाने-पीने का भी संकट है। ऐसी दशा में इन संकटों का मुकाबला करना आसान नहीं है। फिर भी जो कुछ कर सकता हूँ, उसके लिए तैयार हूँ। लेकिन उसी अवस्था में जब कि मेरे कार्यों में बाधा और अविश्वास न उत्पन्न किया जाये। इस संकट के समय मैं जो उचित समझूगा, करूँगा।" राणा के सामने और कोई उपाय न था। उसने अमरचंद की बातों को स्वीकार किया और भगवान एकलिंग की शपथ लेकर अमरचंद को आश्वासन देते हुए उसने कहा – “मैं किसी प्रकार का अविश्वास न करूँगा। यदि आप रानी का रत्नहार और नथ भी माँगेंगे तो उसको देने में इन्कार न करूँगा। आप इसका विश्वास रखें।" जिस समय अमरचंद के साथ राणा की ये बातें हो रही थीं, रघुदेव भी वहाँ पर बैठा था। उसने ऐसे मौके पर राणा को जो सलाह दी थी, उसका विरोध करते हुए अमरचन्द ने रघुदेव से अनेक बातें ऐसी कहीं, जिनको सुनकर उसने अपना तिरस्कार अनुभव किया। इसके बाद, अमरचंद ने सिंधी सेना के प्रधान को बुलाकर कहा-"आप लोग मेरे साथ आइए। आप लोगों के वेतन के जो रुपये बाकी हैं, उनको अदा करने का मैं अभी उपाय करता हूँ। परन्तु जिस कार्य के लिए आपको यह वेतन दिया जा रहा है, उसमें सफलता न मिलने से मैं अपराधी बनूँगा।” अमरचंद ने यह कह कर वेतन के बाकी रुपये अदा करने के लिये सिंधी सेना से दूसरे दिन का वादा किया। एक ही माता के दूध को पीकर पलने वाले दूध भाई कहलाते हैं। यद्यपि उनके जन्म का सम्बन्ध अलग-अलग माता-पिता से होता है। 1 280