पृष्ठ:राजस्थान का इतिहास भाग 1.djvu/२५०

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वादशाह ने चूंडावत सरदार की माँग को मंजूर कर लिया। उसके बाद चूंडावत सरदार अपनी सेना के साथ रास्ते से हट गया। बादशाह की फौज आगे बढ़कर रूपनगर की तरफ रवाना हुई। वहाँ से रूपनगर पहुँचने के लिए तीन दिन का रास्ता बाकी था। बादशाह की फौज चली गयी। चूंडावत सरदार अपनी सेना के साथ उदयपुर की तरफ लौट रहा था, वह घोड़े पर था। उसके शरीर में बहुत से भयानक जख्म थे। उनसे लगातार खून बह रहा था। रास्ते में उसकी हालत बिगड़ने लगी। उसे जैसे ही घोड़े से उतारा गया, उसकी मृत्यु हो गयी। राणा राजसिंह ने पूर्णिमा के दिन रूपनगर पहुँचकर प्रभावती के साथ विवाह किया और उसके बाद उदयपुर लौट गया। वहाँ पहुँचने पर चूंडावत सरदार की मृत्यु का समाचार सुना और यह भी सुना कि वादशाह औरंगजेब ने दस वर्ष तक कोई आक्रमण न करने का वादा करने के बाद रूपनगर जाने का मार्ग प्राप्त किया था। राणा को प्रभावती के साथ विवाह करने की जितनी प्रसन्नता हुई. उससे अधिक वेदना चूंडावत सरदार के मरने से हुई । जयपुर के राजा जयसिंह और मारवाड़ के राजा जसवन्तसिंह ने भी मुगल साम्राज्य की अधीनता स्वीकार की थी। लेकिन इन दोनों राजाओं के हृदयों में राजपूतों का स्वाभिमान था। इसलिए मुगलों की अधीनता में रहते हुए भी दोनों राणा राजसिंह से प्रेम करते थे और मेवाड़ राज्य के शुभचिन्तक थे। इन दिनों में राजसिंह और औरंगजेब के वीच शत्रुता की आग सुलग रही थी। इसमें जयसिंह और जसवंतसिंह राणा राजसिंह के पक्षपाती थे और छिपे तौर पर उसकी सहायता करते थे, इस बात को औरंगजेव भली प्रकार जानता था। औरंगजेब बहुत दिनों तक जयसिंह और जसवंतसिंह से जलता रहा । उसने खुले तौर पर इन दोनों के साथ शत्रुता का कोई व्यवहार न किया। लेकिन अवसर पाकर उसने उन दोनों को विष खिला दिया, उससे उन दोनों की मृत्यु हो गयी। मारवाड़ के राजा जसवंतसिंह के कई लड़के थे। उनमें अजित सब से बड़ा था। पिता के मरने के समय अजित की अवस्था छोटी थी। उसका पालन-पोषण करने के उद्देश्य से उसकी माता अपने पति के साथ सती नहीं हुई थी। वह अपने इस बड़े लड़के को मारवाड़ के सिंहासन पर बिठाना चाहती थी और उसकी छोटी अवस्था के कारण राज्य का प्रवन्ध स्वयं सम्हालना चाहती थी। इन्हीं दिनों में अजित की माता को अपने प्यारे पुत्र अजित के सम्बन्ध में वादशाह औरंगजेब से भय उत्पन्न हुआ। इसलिए वह अपने बालक की रक्षा का उपाय सोचने लगी। उसको राणा राजसिंह के आश्रय के सिवा और कुछ दिखायी न पड़ा। इसके लिए उसने अपना दूत राणा के पास भेजा। राणा ने अजित की रक्षा का भार अपने ऊपर लिया और जसवंतसिंह के लड़कों को मेवाड़ भेज देने के लिए उसकी माता के पास संदेश भेजा। राणा का यह संदेश मिलते ही अजित की माँ ने दो हजार सैनिकों के संरक्षण में अजित को मारवाड़ से रवाना किया। जिस समय मारवाड़ के सैनिक अपने साथ अजित सिंह को लेकर उदयपुर जा रहे थे, उसी समय कूट गिरि के एक तंग रास्ते से दो हजार मुगल सैनिकों ने तेजी के साथ आक्रमण किया। उस रास्ते पर दोनों ओर के सैनिकों में कुछ समय तक युद्ध हुआ। उस पहाड़ी रास्ते में बहुत से मुगल सैनिक मारे गये और मारवाड़ के सैनिक अजित को लेकर उदयपुर की तरफ आगे बढ़ गये। इसके पश्चात मुगलों ने उनका पीछा नहीं किया। राणा राजसिंह ने बड़े सम्मान के साथ अजित सिंह को अपने यहाँ रखा और कैलवाड़ा नाम का 250