पृष्ठ:राजस्ठान का इतिहास भाग 2.djvu/३२४

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उनके अधिकारों का प्रश्न किशोर सिंह की दया पर निर्भर हो जाता है। जिसने अपना सम्पूर्ण जीवन कोटा राज्य की रक्षा करने और उसकी मर्यादा को कायम रखने में व्यतीत किया, उसके साथ ऐसा नहीं किया जा सकता और यदि कोई करता है तो वह न्यायपूर्ण नहीं हैं। अपनी मांगों को लिखकर भेज देने के पहले ही महाराव किशोर सिंह ने अपने आदमियो को युद्ध के लिये एकत्रित किया था। इसलिये पूर्व स्वीकृत संधि को कायम रखने के लिए अंग्रेजी सेना को आदेश दिया गया और वह सेना कालीसिन्धु नामक स्थान पर पहुँच गयी। इस स्थान के एक तरफ महाराव की सेना थी और दूसरी तरफ जालिम सिंह की। दोनों ओर की सेनाओं के पहुंचने के बाद पानी का बरसना प्रारम्भ हुआ और कई दिनों तक लगातार भयानक रूप से पानी बरसता रहा। उस वृष्टि से नदी मे बाढ़ आ गयी और एक ऐसी भयानक परिस्थिति पैदा हो गयी, जिससे महाराव का सम्पूर्ण विश्वास और भरोसा नष्ट हो गया। उसने फिर से मेल करने का भाव प्रकट किया और अंग्रेज प्रतिनिधि पर अपना विश्वास स्वीकार किया। लेकिन उस समय भी वह कहता रहा। "सम्मान खोकर जिन्दा रहने से क्या लाभ और अधिकारो के बिना राज्य को क्या फायदा, पूर्वजों के राज्य को खोकर जीवित रहने से मर जाना अधिक अच्छा है।" ___ महाराव किशोर सिंह की अपेक्षा जालिमसिंह का व्यवहार इन दिनों मे कुछ कम उलझन से भरा हुआ न था। वह बार-बार अपनी राजभक्ति का परिचय देता था और अपने सफेद बालो में किसी को कालिमा लगाने का मौका नहीं देना चाहता था। अपनी रक्षा के लिए उसने सधि को ढाल बना लिया था। यद्यपि वह भविष्य मे अपने अधिकारो की सुरक्षा चाहता था। लेकिन उसके लिए वह स्वयं कुछ करना नहीं चाहता था। उसको भय था कि मैंने जीवनभर इस राज्य की रक्षा की है। इस समय अपने पक्ष का समर्थन करने से मैं वदनाम हो जाऊँगा। यद्यपि उससे स्पष्ट रूप मे यह बात कही गयी कि अगर आप भविष्य में अपने उत्तराधिकारियों के लिए अधिकारों का निर्णय चाहते हैं तो आपको खुलकर अपने पक्ष का समर्थन करना चाहिये। राजभक्ति का प्रदर्शन करने से काम न चलेगा। लेकिन जालिम सिंह के मन के भाव डावॉडोल हो रहे थे। मैंने अनेक बार उसको दुविधा की बाते कहते सुना और उसे सचेत करते हुए मैने कहा कि अब भी अवसर है। लेकिन अन्तिम समय की दुविधा प्रतिकूल परिणाम का परिचय देती है। यद्यपि दोनों तरफ की परिस्थितियाँ उस समय अत्यन्त कठोर हो रही थी, इसलिए शांतिपूर्ण उपायो का अवलम्बन बहुत दूर हो गया था। महाराव किशोर सिह ने मेरे पास पत्र भेजकर हाँ अथवा नही की प्रतीक्षा की थी और विरोधी अवस्था को समझने के पहले ही वह युद्ध के लिए बिल्कुल तैयार था। इसलिए उसके साथ मुकाबला करने के लिए जालिम सिंह से परामर्श हुआ और एक सम्मिलित सेना तैयार की गयी। उस सेना के अधिकारियों के सम्बन्ध में भी हमारे साथ उसने बातचीत की। उसके प्रार्थना करने पर एक अग्रेज सेनापति ने उसको अपनी सेना की सहायता दी।* पाँच नम्बर रेजीमेण्ट देशी पैदल सेना के सेनापति लेफ्टिनेन्ट मिल ने अपनी तरफ से युद्ध मे जालिम सिंह की सहायता करना स्वीकार किया और वह युद्ध में गया। एक सेनापति से इससे अधिक और क्या आशा की जा सकती है। 318