पृष्ठ:राजस्ठान का इतिहास भाग 2.djvu/२९४

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और बोहरा महाजनों के बीच एक ऐसा व्यवहार प्राचीन काल से चला आ रहा था कि उससे उनके बीच में किसी प्रकार की कटुता न थी। महाजन किसानों पर ऋण देने के बाद भी किसी प्रकार का अत्याचार इसलिए नही करते थे कि फिर उनसे किसान लोग ऋण में रुपये न लेंगे और उनके एसा करने से उन महाजनों का व्यवसाय मारा जाएगा। कोई किसान अपने महाजन के साथ ऋण की अदायगी में किसी प्रकार की वेईमानी इसलिए न करता था कि उससे फिर कोई महाजन उसको ऋण मे रुपये न देगा। इसलिए उन महाजनों और किसानों के बीच बहुत प्राचीनकाल से सन्तोपजनक व्यवहार चला आ रहा था। जालिम सिंह ने किसानों से निर्धारित कर के अतिरिक्त अधिक वसूल न करने के लिए पटेलों को सभी प्रकार विवश कर दिया। इस दशा में उन पटेलों ने किसानों को लूटने के लिए एक नया रास्ता निकाला और उन्होने वोहरा लोगों के व्यवसाय को नष्ट करके स्वयं महाजनों का कार्य आरम्भ किया। उन्होंने यह भी सोच डाला कि जालिम सिंह को हम लोगों पर अप्रसन्न होने का अवसर न मिले, इसलिए उन्होंने एक बीच के मार्ग का आश्रय लिया। किसान लोग अपने खेतो का अनाज तैयार हो जाने पर राज्य-कर की अदायगी किया करते थे। लेकिन अब पटेलों ने एक नया नियम यह बना दिया कि खेतों का अनाज तैयार होने के पहले ही किसानो को राजा की मालगुजारी अदा कर देनी चाहिए। ___पटेलों का यह नियम किसानों के लिए अत्यन्त घातक सिद्ध हुआ। इसलिए कि खेतों के अनाज को छोड़कर राज्य-कर अदा करने के लिए उनके पास दूसरा कोई साधन न था। इसलिए उनके सामने भयानक संकट पैदा हो गया। अपनी इस विपदा के समय ऋण में रुपये लाने के लिए किसान लोग बोहरा महाजनो के पास दौड़ने लगे। पटेलों ने महाजनों से कह दिया कि जब तक किसान लोग मालगुजारी का रुपया अदा न कर दे, वे लोग किसानों को ऋण में रुपये न दें। पटेलों के ऐसा कह देने के बाद उन महाजनों ने किसानों को रुपये देने से इन्कार कर दिया। इस दशा में राज्य के किसान पटेलों की शरण में आने के लिए विवश हो गये। अब उनको राज्य मे कोई दूसरा स्थान दिखायी न पड़ा, जहाँ से वे रुपये लाकर राजा की मालगुजारी में पटेलों को देते। वे लोग न तो अपने खेतों का उत्पन्न अनाज किसी को बेच सकते थे और न कहीं से ऋण में रुपये ला सकते थे। इस भयंकर परिस्थिति में किसानों ने अपने खेतो का अनाज पटेलों के यहाँ लाकर रखना आरम्भ किया। क्योकि राज्य में मालगुजारी के रुपयों मे अनाज का लेना बन्द हो गया था और वे उनको रुपये देते थे। उस एकत्रित अनाज का भाव पटेलों पर निर्भर था, इसलिए कि दूसरा कोई अपने भाव में उस अनाज को खरीद नहीं सकता था। इसलिए मनमानी भाव लगाकर अनाज के रूपये का हिसाब करके पटेलों ने किसानों को रसीद दी और उनसे लिखा लिया कि राज्य-कर देने के लिए हमारे पास रुपये न थे और हमारे इस अनाज का कोई दूसरा लेने वाला न था, इसलिए अपनी इच्छा से हमने अपना अनाज अपने भाव से पटेल को दिया है और उससे रुपये लेकर हमने राज्य-कर अदा किया है। पटेलों के किसानो से इस प्रकार लिखा लेने का अभिप्राय यह था कि जिससे जालिम सिंह को यह न मालूम हो कि पटेलों ने किसानो पर किसी प्रकार का अत्याचार किया है। इस 288