पृष्ठ:राजस्ठान का इतिहास भाग 2.djvu/२२४

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अपनी तलवार लेकर नापाजी का संहार करने वाले टोंडा राजकुमार पर उसने आक्रमण किया। सामन्त की तलवार से राजकुमार का एक हाथ कटकर नीचे गिर गया। टोंडा के सैनिकों ने राजकुमार को लेकर वहाँ से भागने की कोशिश की। राजकुमार के कटे हुए हाथ को अपने दुपट्टे में बाँधकर सामन्त उसी समय बूंदी राजधानी आया। राजधानी में पहुंचकर सामन्त को मालूम हुआ कि नापाजी के मारे जाने से राजमहल में चीत्कार हो रहा है। सोलंकी रानी-जिसके भाई ने उसके पति का संहार किया था-अपने स्वामी के मृत शरीर को लेकर चिता पर बैठने की तैयारी कर रही थी। सोलंकी रानी जिस समय चिता पर बैठने के लिए तैयार हो रही थी,सामन्त ने आकर हत्या करने वाले टोंडा के राजकुमार का कटा हुआ हाथ अपने दुपट्टे से निकालकर उसके सामने रखा। उस हाथ में बँधे हुए कंकण को देखकर सोलंकी रानी पहचान गयी कि यह हाथ उसके भाई का है। उसने उस कटे हुए हाथ को देखकर अपने भाई के नाम एक पत्र लिखा कि आपके ऐसा करने से आपका वंश कलंकित हो चुका है। इसके कलंक को धोने का उपाय करिये। आपके सभी वंशधर एक हाथ वाले सोलंकी के नाम से पुकारे जायेंगे। टोंडा के राजकुमार ने अपनी बहन का यह पत्र पाकर पढ़ा और अपने अपराध का कोई प्रतिकार न समझकर उसने एक स्तम्भ पर अपने मस्तक को इतने जोर से पटका कि उसके प्राणों का उसी समय अन्त हो गया। नापाजी के तीन लड़के थे। पहले लड़के का नाम हामाजी, दूसरे का नवरंग और तीसरे का थारूड नाम था। सन् 1384 में हामा सिंहासन पर बैठा। नवरंग के वंशज नवरंग पोता और थारूड के वंशज थारूड हाड़ा के नाम से प्रसिद्ध हुये। यह पहले लिखा जा चुका है कि राव देवा ने बूंदी राज्य की प्रतिष्ठा करने के पहले पठार का राज्य और बम्बावदा का दुर्ग अपने लड़के हरराज को दे दिया था। हरराज के बाद उसका बड़ा लड़का पठार के सिंहासन पर बैठा। उसके शासन काल में चित्तौड़ के राणा के साथ उसका संघर्ष पैदा हुआ। उस संघर्ष में राणा ने पठार पर अपना अधिकार कर लिया। अलाउद्दीन के द्वारा चित्तौड़ का विध्वंस होने पर वहाँ की राजशक्तियाँ निर्बल हो गयी थीं और वहाँ के राणा उसी निर्बल अवस्था में शासन कर रहे थे। उन दिनों में चित्तौड़ के बहुत से सामन्तों ने अपनी अधीनता के बन्धन को तोड कर स्वतत्रता प्राप्त कर ली। इसके कुछ दिनों के बाद चित्तौड़ की शक्तियाँ फिर से प्रबल हो उठी। इसलिये वहाँ के राणा ने उन राजाओ को फिर से अपनी अधीनता में लाने की कोशिश की, जो अवसर पाकर स्वतंत्र हो गये थे। राणा ने सबसे पहले हामाजी के पास सन्देश भेजा कि जिन नगरों और ग्रामों में बूंदी के राज्य की प्रतिष्ठा हुई है, वे सब चित्तौर राज्य के हैं। इसलिये बूंदी के राजा को चित्तौर की अधीनता स्वीकार करनी पड़ेगी और अधीन राज्यों के जो नियम हैं, बूंदी के राजा को भी उन्हे स्वीकार करना पड़ेगा। बूंदी के राजा हामाजी ने राणा को इसका उत्तर देते हुए लिखा: "मैं किसी प्रकार चित्तौड के राणा का सामन्त नहीं हूँ। मीणा लोगों के नगरों और ग्रामों को तलवार के बल पर लेकर बूंदी राज्य की प्रतिष्ठा हुई है।" चित्तौड़ के राणा और बूंदी के हामा जी में ऊपर लिखे हुए पत्र व्यवहार हुये और उनमे दोनो तरफ से जो लिखा गया, उसमे सत्य क्या है, यह विचारणीय है। हामा जी का एक 216