पृष्ठ:राजस्ठान का इतिहास भाग 2.djvu/१६१

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काम लिया। उसने ऐसा कार्य किया, जिससे मुगल प्रधानमंत्री को बहुत संतोप मिला और उसने खण्डेला का अधिकार उदय सिंह को सौंप दिया और उदयसिंह उसके बाद फिर अपने पिता के सिंहासन पर बैठा। खण्डेला का राज्याधिकार पाकर उदयसिंह ने अपनी सैनिक शक्ति को मजबूत करने की कोशिश की। वह भली प्रकार इस बात को समझता था कि खण्डेला राज्य के पतन का कारण मनोहरपुर का राजा है इसलिये उसने उससे बदला लेने का निश्चित इरादा किया। अपनी सेना को प्रबल बना कर उदयसिंह ने मनोहरपुर राज्य पर आक्रमण किया। मनोहरपुर के राजा को जब यह समाचार मिला तो उसने अपने धाभाई के अधिकार में सेना देकर युद्ध के लिए भेजा। वह मनोहरपुर की सेना को लेकर रवाना हुआ। लेकिन युद्ध शुरू होने के पहले ही वह भाग गया। इस दशा में उदय सिंह ने अपनी सेना को लेकर मनोहरपुर को घेर लिया। मनोहरपुर का राजा युद्ध करने की अपेक्षा धोखा देने और विश्वासघात करने में अधिक चतुर था। उसे मालूम हुआ कि कासली का सामन्त दीपसिंह भी अपनी सेना को लेकर उदयसिंह के साथ हमारे विरुद्ध युद्ध करने आया है। इसलिए उसने अपने दो अत्यन्त चतुर और विश्वासी दूतो के द्वारा दीपसिंह के पास अपना एक पत्र भेजा। उसमे उसने दीपसिंह को लिखा"उदय सिंह न केवल मनोहरपुर में अधिकार करेगा, बल्कि इसके वाद कासली को भी अधिकार में लेने का उसका एक निश्चित इरादा है। इस बात को आप निश्चित समझिए।" इस पत्र को पाकर और पढ़ कर दीपसिंह ने उस पर विश्वास कर लिया। सवेरा होते ही उदय सिंह ने युद्ध के बाजे बजवाये और उसने मनोहरपुर पर आक्रमण करने की तैयारी की। उसी समय दीपसिंह अपनी सेना के साथ उस स्थान को छोड़ कर अपनी राजधानी कासली की तरफ चला गया। उदय सिंह की समझ में न आया कि दीपसिंह ने ऐसा क्यों किया। उदय सिंह ने अपनी सेना लेकर दीपसिंह का पीछा किया। दीपसिंह ने जब यह देखा तो उसको मनोहरपुर के राजा के पत्र का पूरा विश्वास हो गया। दीपसिंह घवरा कर जयपुर के राजा के यहां चला गया। उदय सिंह ने कासली पहुँच कर उस पर अधिकार कर लिया। इसका परिणाम यह हुआ कि मनोहरपुर में उदय सिंह का जो आक्रमण होने वाला था, वह खत्म हो गया। राजा जयसिंह इन दिनों में आमेर के सिंहासन पर था। दीपसिंह के वहाँ पहुंचने पर राजा जयसिह ने कहा: "यदि आप हमारी अधीनता स्वीकार कर लें तो हम आपकी सहायता करेगे और कासली का अधिकार फिर से आपको मिल जाएगा।" दीपसिंह के सामने अपने उद्धार का कोई और रास्ता न था। उसने राजा जयसिंह की बात को स्वीकार कर लिया और जयपुर राज्य की अधीनता स्वीकार करने के लिये हस्ताक्षर करते हुए उसने चार हजार रुपये वार्षिक कर मे देना भी मंजूर किया। इस तरह शेखावत सामन्तों पर जयपुर के राजा के आधिपत्य का फिर से सूत्रपात हुआ। शेखावत सामन्तों की संख्या बहुत थोडी थी और उनके अधिकारो में जो सेनायें थी, वे भी अधिक न थीं। कासली के सामन्त दीपसिंह के अधीनता स्वीकार कर लेने पर कई दिनों के बाद आमेर के राजा जयसिंह ने सूर्य ग्रहण के समय गंगा-स्नान के लिए जाने की तैयारी की। उसके साथ दीपसिंह भी रवाना हुआ। गंगा के किनारे पहुँचकर जयसिंह ने स्नान किया और 153