पृष्ठ:राजस्ठान का इतिहास भाग 2.djvu/१४१

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साथ सन्धि करनी पड़ी। इस बार की सन्धि में जयपुर राज्य पहले की अपेक्षा अधिक जकड़ा गया। पहली सन्धि में उससे कर लेने की कोई शर्त न रखी गयी थी। दूसरी बार की सन्धि में जयपुर राज्य को कर देना स्वीकार करना पड़ा। यह सन्धि दस शर्तो में तैयार की गयी। विस्तार के भय से सन्धि की शर्तों का उल्लेख हम यहाँ नहीं करना चाहते। इस दूसरी सन्धि के अनुसार राजा जगतसिंह ने ईस्ट इण्डिया कम्पनी को कर के रूप में आठ लाख रुपये वार्पिक देना स्वीकार किया और इस सन्धि को मंजूर करके उसने जयपुर राज्य की अधीनता का अन्त कर दिया। यद्यपि उन दिनों में राज्य की परिस्थितियाँ इतनी भयानक हो गयी थी कि अंग्रेजों की सन्धि के विना जयपुर राज्य का कार्य किसी प्रकार चल न सकता था और यदि उसने ऐसा न किया होता तो आक्रमणकारी लुटेरों ने उसकी बची हुई जिन्दगी का भी विनाश कर दिया होता। आमेर के सिंहासन पर बैठकर जगतसिंह ने अपने पूर्वजों के गौरव के अनुसार एक भी कार्य न किया। उसके शासनकाल में प्रायः नित्य ही एक-न-एक ऐसी घटना हुआ करती थी, जो उस राज्य को तेजी के साथ पतन की ओर ले जाने का कार्य कर रही थी। उसके समय में अनेक बार राज्य पर आक्रमण हुए, राज्य लूटा गया। शत्रुओं ने भयानक रूप से प्रजा का विध्वंस और विनाश किया। जगतसिंह अपनी अयोग्यता के कारण इस दुरावस्था में राज्य की रक्षा न कर सका। उसने ऐसे अवसरों पर आत्म-समर्पण किया और युद्ध का खर्च देकर जान बचायी। वह राजपूत था लेकिन क्षत्रियोचित उसमे शौर्य स्वाभिमान न था। अपने अनुचित कार्यो से उसने व्यक्तिगत चरित्र को भी कलङ्कित किया था। रसकपूर नामक एक वेश्या की लड़की से उसने प्रेम किया था, जिसके कारण उसको सिंहासन से उतार देने के लिए कुछ मन्त्रियों और सामन्तों ने तैयारी की थी। रसकपूर से अप्रसन्न होकर राज्य के अधिकारियों ने उसे नाहरगढ़ के दुर्ग मे भेज देने का निर्णय किया। उस दुर्ग में राज्य के अपराधी भेजे जाते थे। लेकिन राजा जगतसिंह के कारण पकपूर वहाँ भेजी न जा सकी। राजा जगतसिंह ने उस मुस्लिम लड़की को अपनी रखैल बनाकर अपने यहाँ रखा और आधे राज्य का उसको अधिकारी बना दिया। राजा जगतसिंह ने अपने राज्य में रसकपूर के नाम से सिक्का चलाया। एक बार वह रसकपूर के साथ घूमने के लिए निकला और अपने सामन्तो से उसने उसके प्रति उसी प्रकार का सम्मान प्रकट करने के लिए आदेश दिया, जिस प्रकार का सम्मान सामन्त लोग अपने राजवंश की महिलाओ के प्रति प्रकट किया करते थे। सामन्तों ने उसकी इस आज्ञा को स्वीकार नहीं किया। उसके दरबार में शिवनारायण मिश्र नाम का एक ब्राह्मण था। वह राज्य के प्रधानमंत्री के पद पर इसीलिए नियुक्त किया गया था कि वह रसकपूर को लडकी कहकर पुकारता था। राजा जगतसिंह की आज्ञाओं का विरोध करके दूनी के सामन्त चॉदसिंह ने आवेश में आकर कहा था- "मैं किसी भी उस आयोजन में भाग न लूँगा जिसमें रसकपूर मौजूद होगी।" चॉदसिंह की इस बात को सुनकर जगतसिह ने उस पर दो लाख रुपये का जुमाना किया। जुर्माने की यह रकम उसकी जागीर दूनी की चार वर्ष की आमदनी थी। मनु ने अपनी पुस्तक मनुस्मृति में राजा को सिंहासन से उतार देने की व्यवस्था का वर्णन किया है। आमेर के सामन्तों ने उस व्यवस्था का आश्रय लेकर जगतसिंह को सिंहासन से 133