पृष्ठ:राजस्ठान का इतिहास भाग 2.djvu/१०८

यह पृष्ठ अभी शोधित नहीं है।

नदी तक विस्तृत पर्वत माला काली खो के नाम से प्रसिद्ध थी। मीणा लोग वहीं के मूल निवासी हैं। वे लोग अम्बादेवी के पुजारी थे और उसी के नाम से उन लोगों ने अपने राज्य का नाम अम्बेर अथवा आमेर रखा । वहाँ की पर्वत माला में जो लोग रहा करते थे, लोहवाँक, माची और बहुत से प्रसिद्ध नगर उनके अधिकार में थे। वावर और हुमायूँ तथा भारमल्ल के शासनकाल में मीणा लोग अत्यंत शक्तिशाली थे। राजपूत लोग उनसे सदा सशंकित रहते थे। उन स्वतंत्र मीणा लोगों के अधिकार में नाहन नाम का एक प्राचीन नगर भी था। भारमल्ल ने मुगलों की सहायता से उस नगर का विध्वंस और विनाश किया था। वहाँ पर जो मीणा लोग रहते थे, उनके बल और पराक्रम की प्रशंसा ग्रन्थों में पढ़ने को मिलती है। नाहन नगर में जो मीणा राजा रहता था, उसने अपने राज्य में वावन दुर्ग और तोरण द्वार बनवाये थे। दिल्ली के सिंहासन पर सवसे पहले जो मुसलमान वादशाह वैठा उस समय मीणा लोग अत्यन्त शक्तिशाली थे। भारमल्ल ने नाहन का विध्वंस करके उसके स्थान पर मालिवाण नाम का नगर बसाया। कुन्तल के वाद पजून उसके राजसिंहासन पर बैठा। उसके वल-विक्रम का उल्लेख ऊपर किया जा चुका है। उसके साथ चौहान सम्राट पृथ्वीराज की बहन का विवाह हुआ था।* सिंहासन पर बैठने के समय पृथ्वीराज ने एक सौ अस्सी राजाओं को अपने यहाँ आमंत्रित किया था और आने वाले राजाओं में राव पजून को ऊँचा स्थान दिया गया। पृथ्वीराज के साथ अनेक युद्धों में राव पजून ने संग्राम किया और दो संग्रामों में इसको बहुत बड़ी ख्याति मिली। शहाबुद्दीन गौरी को प्रथम युद्ध में पराजित करने का श्रेय वहुत-कुछ राव पजून को भी था। संग्राम से भागने के बाद पजून ने गौरी का पीछा किया और वह गजनी तक उसका पीछा करता हुआ गया था। चन्देलों के नगर महोवा पर अधिकार कर लेने से राव पजून की बड़ी प्रसिद्धि हुई थी। वह महोबा का शासक भी नियुक्त किया गया था। पृथ्वीराज ने कन्नौज के राजा जयचन्द की लड़की संयुक्ता को बलपूर्वक लाकर उसके साथ विवाह किया। उस समय पृथ्वीराज और जयचन्द में जो भीषण युद्ध हुआ था। उस युद्ध में पृथ्वीराज की तरफ से जिन चौंसठ राजाओं ने युद्ध किया, उन चौंसठ राजाओं में एक राव पजून भी था। वह युद्ध भयानक रूप से लगातार पाँच दिन तक हुआ था। उस युद्ध में राव पजून ने कन्नौज की विशाल सेना के साथ भयानक संग्राम किया और उसके कारण पृथ्वीराज संयुक्ता को लेकर सफलतापूर्वक दिल्ली चला गया। उस युद्ध में यद्यपि राव पजून मारा गया, लेकिन पृथ्वीराज की सफलता का वहुत कुछ कारण राव पजून था। उसने प्राण देकर युद्ध मे पृथ्वीराज को विजयी वनाया। उसकी वीरता का वर्णन कवि ने अपने ग्रन्थ में बहुत अधिक किया है। राव पजून के साथ मेवाड़ का गहिलोत सामन्त भी उस युद्ध में शामिल था और वे दोनों एक साथ युद्ध करते हुए मारे गये। राव पजून के युद्ध की प्रशंसा करते हुए प्रसिद्ध कवि चन्द ने लिखा है- "जिस समय पृथ्वीराज का एक शूरवीर गोविन्दराय मारा गया, उस समय शत्रु पक्ष के लोग बहुत प्रसन्न हुये। परन्तु उसके कुछ ही समय के बाद राव पजून अपने दोनों हाथों से भीपण मार-काट करता हुआ आगे बढ़ा। उस समय चार सौ शत्रुओ ने एक साथ पजून पर आक्रमण किया। यह देखकर पीपा, अजान, बाहु, नरसिंह, कच्चरराय आदि सामन्तों ने पजून राव की सहायता में शत्रुओं के आक्रमण को रोकने दृमरे संगकों के अनुसार पजून पृथ्वीराज का बहनोई नहीं, माला था। अनुवादक 100