पृष्ठ:राजस्ठान का इतिहास भाग 2.djvu/१०४

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अयोध्या कोशल राज्य की राजधानी थी। वहाँ के राजा रामचन्द्र के दूसरे पुत्र कुश से कुशवाहा अथवा कछवाहा वश की उत्पत्ति हुई। कुश के किसी वंशज ने अपने पूर्वजों की राजधानी को छोडकर शोण नदी के किनारे रोहतास नाम का एक दुर्ग वनवाया था। उसके बहुत दिनों बाद उमी वश के राजा नल ने सन् 295 ई में नरवर अथवा निपध नाम की राजधानी कायम की। राजा नल के उत्तराधिकारियो ने 'पाल' की उपाधि धारण की थी। राजा नल से तेंतीस पीढ़ियों के बाद साहासिंह के पुत्र धोलाराय को उसके पिता के राज्य से निकाला गया और उसने सन् 967 ईसवी मे ढूँढाड नाम की राजधानी कायम की। ऊपर यह लिखा जा चुका है कि जयपुर का प्राचीन नाम लूंढाड था। अंग्रेज लेखकों ने जयपुर को अम्बेर के नाम से लिखा है। अम्वेर आमेर के नाम से भी प्रसिद्ध है। इस राज्य का इतिहास लिखने के लिए एतिहासिक सामग्री हमे मिली है, उसी का हमे आश्रय लेना पड़ता है। राजा नल से इकतीस पीढीयों के बाद सोंढादेव ने नरवर मे शासन किया। उसकी मृत्यु हो जाने पर उसके भाई ने अपने भतीजे धोलाराय के-जो उस समय केवल शिशु अवस्था मे था-अधिकारो को छीन लिया और सिंहासन पर बैठा। धोलाराय की माँ अपने देवर का अत्याचार देखकर वबरा गयी और अपने पुत्र के प्राणो की चिन्ता करने लगी। वह किसी प्रकार अपने बालक की रक्षा करना चाहती थी। उसे अपने देवर से बहुत भय उत्पन्न हो गया था। उसको उससे सभी प्रकार की आशंकाये थीं। इसलिए उस माता ने अपने छोटे बच्चे के प्राणों की रक्षा के लिए भिखारिणी का रूप धारण किया और अपने बालक धोलाराय को कपड़ों में लपेट कर वह अपने नगर से निकल गयी। अपने बालक को लिये हुए भिखारिणी माता जयपुर राज्य से पाँच मील की दूरी पर खोह गाँव में पहुंची। उस गाँव में मीणा लोगों की आबादी थी। उस गाँव के बाहर एक स्थान पर रुककर उसने कुछ देर विश्राम करने का इरादा किया। इस प्रकार के कप्टों का सामना करने के लिए उसके जीवन में यह पहला अवसर था। वह भूख और प्यास से पीडित हो रही थी। पैदल चलने के कारण वह बहुत थक गयी थी। अपने चारों तरफ विपदाओ का पहाड़ देखकर वह वहुत घबरा रही थी। उसकी समझ में न आता था कि मेरे और मेरे बच्चे के भविष्य मे क्या होने वाला है? उसके छोटे बालक का मुख सूख रहा था, उसकी यह दुरवस्था देखकर भिखारिणी राजमाता की घबराहट बहुत बढ़ गयी। उस स्थान के निकट एक वृक्ष था। उसमे कुछ फल दिखायी पडे। रानी ने उसके फलों को लाकर अपनी क्षुधा मिटाने की इच्छा की। जिस पेड़ के नीचे वह रुकी थी, वहाँ पर अपने वस्त्रो मे छोटे बालक को लिटा कर वह फल लेने के लिए गयी। कुछ लेखको का कहना है कि बिहार का रोहतासगढ राजा हरिशचन्द्र के पुत्र रोहिताश्व का बनवाया हुआ है। साधारण तोर पर यह बात सही भी मालम होती है। -अनु एक दूसरे ऐतिहासिक विवरण से प्रकट होता है कि राजा नल ने सम्वत् 315 में नरवर की स्थापना की थी। परन्तु नल से धोलाराय तक तैंतीम पुरुषों का जन्म होता है। यदि इनम से प्रत्येक ने बाईस वर्ष तक राज्य किया तो 736 वर्ष होते हैं। चोलाराय सम्वत् 1023 में निकाला गया था। इसलिए 276 को घटा देने से 297 वर्ष बाकी रहते हैं। इस प्रकार 54 वर्ष का अन्तर पडता है। यदि उनके शासन काल को 21 वर्ष का मान लिया जाये तो बहुत कम अन्तर रह जाता है और मम्वत् 351 में निपध राजधानी की स्थापना सही मालूम होती है। 96