यह पृष्ठ अभी शोधित नहीं है।

अकबर का मुकाबला किया। बहुत कठिन युद्ध हुआ। अंत में शोहज़ादा हार कर अंजमेर को भाग गया । पुस्तक का अंतिम उल्लास पढ़ते पढ़ते भास होने लगता है कि कवि यहीं पर ग्रंथ को समाप्त नहीं करना चाहता था, परंतु इसी वर्ष ( संवत् १७३७ वि० ) महागणा राजसिंह का देहान्त होगया । इस लिये कवि ने अचानक ग्रंथ की समाप्ति, की है। सभा ने इस पस्तक का सम्पादन भार मके सौंपा और मैंने सहर्ष स्वीकार किया । मैं युक्तप्रदेश का निवामी हूं। पुस्तक में राजपूताना के शब्दों की भरमार है। मैंने अपनी शक्ति भर तो कसर कोताही नहीं की, परंतु बहुत सम्भव है कि इसमें अनेक अशुद्धियों हो गई हों। इस लिये पठाकों से नम्रतापूर्वक निवेदन है कि उन अशुद्धियों के कारण सभा पर कोई दोषारोपण न करें वरन् उसका कारण मेरी अल्पज्ञता ही समझे। यदि सुविज्ञ पाठक इतनी कृपा और करें कि अशुद्धियों से भभा को सूचित कर दें तो म के पूर्ण आशा है कि द्वितीय संस्करण में सभा -उन पर ध्यान देकर संशोधन कर देगी। काशी विनीत,. २९-११-१९१२ । भगवानदीन ।