पृष्ठ:रहीम-कवितावली.djvu/८१

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रहीम-कवितावली। सम्पति भरम गँवाइ के, हाथ रहत कछु नाहि । ज्यों रहीम ससि रहत है, दिवस प्रकासहि माहि ॥ २४०।। सरवर के खग एक से, प्राति बादि नहिं धीम। पै मराल को मानसर, एकै ठौंरु रहीम ॥ २५१ ॥ सर सूखे पंछी उड़ें, औरै सरनि समाहि । दीन मोन बिन पंख के, कहु रहीम कहँ जाहिं ॥ २४२ ॥ ससिसकोच साहस सलिल, मान . सनेह रहीम । बढ़त-बढ़त बाढ़े जात है, घटत-घटत घटि सीम॥२४३॥ ससि की सीतल चाँदनी, सुन्दर सबहिं सुहाइ । लगै चोर चित मैं लटो, घटि रहीम मन अाइ ॥२४४॥* सबै कहावत ललकरी, सब लसकर को जाइ। सैल सड़ाके जो सह, वही जगीर खाई॥२५॥ स्वासहु तुरिय जो उच्चरै, तिय है निहचल चित्त । पूत परा घर जानिए, रहिमन तीनि पवित्त ॥ २४६॥ स्वारथ रुचत रहीम सब, श्रोगुन हूँ जग माहि । बड़े-बड़े बैठे लख्यो, पथ-रथ-कूपर छाहिं ॥ २४७॥ सीत हरत तम भ्रम मिटत, नैन खुलत बे चक। का रहीम रबि को घट्यो, जो नहिं लख्यो उलूक ॥ २४८ ॥ सुलगे जेते बुझि गए, वुझे ते सुलगे नाहिं । रहिमन दाहे प्रेम के, बूझि-बूझि सुल गाहिं ॥ २४६ ॥ . * २४४-इसी भाव का एक दोहा 'बन्द' का भी है:- जासौं जाको हित सधै, सोई ताहि सुहात । चोर न प्यारी चाँदनी, जैसे कारी रात ॥