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हरिऔध--]
[-रस-साहित्य-समीक्षाएँ
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'वैदेही बनवास' और 'परिजात' उनके अन्य ऐतिहासिक तथा सांस्कृतिक महत्व के महाकाव्य हैं।

हरिऔध जी के आलोचक तथा गद्यकार रूप को उनकी कविता ने दबा दिया। पर वे हिन्दी के विशिष्ट गद्यकार भी हैं।

हरिऔध जी ने गद्य के क्षेत्र में ४ प्रकार की रचनाएँ लिखी--

१. प्रारम्भिक-सर्जनात्मक साहित्य, २. आलोचना-साहित्य, ३. नीति तथा धर्म साहित्य, ४. सामयिक साहित्य।

धर्म-संस्कार तथा सामयिक विषयों पर लिखे गये निबन्धों की महत्ता भले ही न हो, पर गद्य के क्षेत्र में उनकी महत्ता ऐतिहासिक है।

१. गद्य के क्षेत्र में सर्वप्रथम वे नाटक और उपन्यासकार के रूप में आये और उस समय आये जब हिन्दी में उनका आरम्भ हो रहा था। उपन्यास के द्वारा उन्होंने अपने पाण्डित्य से अपनी शब्द-शक्ति का परिचय हिन्दी जगत को दिया। उन रचनाओं का महत्व ऐतिहासिक क्रम विकास की दृष्टि से है, तथा जो बात गद्य के क्षेत्र में उस समय भी उपस्थित कर सके, वह उनकी शब्दशक्ति का परिचायक है।

आलोचना के क्षेत्र में उनकी देन साहित्यिक निबन्धों का संकलन, हिन्दी भाषा और साहित्य का विकास (बाबू राम दहेन सिंह, रीडरशिप के सम्बन्ध में पटना यूनिवर्सिटी में दिये गये व्याख्यानों का संग्रह) तथा पुस्तकों एवं ग्रन्थों की भूमिका के रूप में है।

वे काशी विश्वविद्यालय में हिन्दी के अध्यापक थे, साथ ही उनका पदार्पण साहित्य में जिस वातावरण और जिस काल में हुआ वह संधि का काल था, तो भी सतत नवीन दृष्टि से सामंजस्यस्थापन का जैसा विस्तृत भाव उनमें दीख पड़ता है उतना अन्य किसी तत्कालीन लेखक में नहीं। वे सर्वप्रथम हिन्दी भाषा और