पृष्ठ:रसिकप्रिया.djvu/२६८

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रसिकप्रिया -निंदा करते हैं। अतः अपने बड़प्पन का ध्यान छोड़कर (मैं तुझसे वय में बड़ी हूँ फिर भी) तुझे समझाने आई हूँ, तू उनसे शीघ्र ही मिल । उन्होंने तो उसी दिन से पृथ्वी के मीठे पदार्थों को छोड़ दिया है। सुधा को भी उन्होंने मधुरों की श्रेणी से हटा दिया है । सूचना-(१) यह छंद 'कविप्रिया' के छठे प्रभाव में मधुर वर्णन के उदाहरण में रखा गया है। (२) इस छंद में 'महूख' शब्द ध्यान देने योग्य है । कहीं कहीं 'महूख' के स्थान पर 'मयूख' रूप भी मिलता है। 'केशव' ने 'रसिकप्रिया' के ही बारहवें प्रभाव के पाँचवें छंद में-'ऊस रस केतक महूख रस मीठो है पियूखहू की पैली घा, जाकों नियराइहै' लिखा है । विहारी ने भी अपने एक दोहे में इस शब्द का व्यवहार किया है। 'देव' ने भी इसका बहुत व्यवहार किया है । देखने में तो यह शब्द संस्कृत मधूक' से बिगड़ा हुआ जान पड़ता है। पर टीकाकारों ने इसका अर्थ 'शहद' किया है वहाँ 'महुआ' के साथ साथ 'महूख' पृथक् भी दिया है । इससे ऐसा स्पष्ट जान पड़ता है कि वे 'महूख' का अर्थ 'महुआ' नहीं लेना चाहते- मधुर प्रियाधर सोमकर माखन दाख समान । बालक बातें तोतरी कबिकुन्त उक्ति प्रमान | महुवा मिसरी दूध घृत, अति सिँगाररस मिष्ट । ऊख महूख पियूष गनि केसव साँचो इष्ट । ऐसी दशा में महूख' को 'मधुक' का बिगड़ा रूप ही मानना पड़ेगा और 'क स्वार्थे' (उसी अर्थ में ) लगा माना जायगा । अपरंच-( कबित्त) (५०३) दनुज मनुज जीव जल थल जननि को, पखोई रहत जहाँ काल सों समरु है। अजर अनंत अज अमरौ मरत परि, केसव निकसि जाने सोई तौ अमरु है। बाजत स्रवन सुनि समुझि सबद करि, बेदन को बाद नाहिं सिव को डमरु है । भागहु रे भागौ भैया भागनि ज्यों भाग्यो परै, भव के भवन माँझ भय को भँवरु है।४० -जलज थलजनि । जननि०-केसौराइ। अजर-अनंत अनंत, अजर अमर, अनंत अजर | अमरी-अरोऊ । बाजत-जब तू । सबद०-सबै मनट । परै-झाइ। ४०-जल- 1