पृष्ठ:रसिकप्रिया.djvu/२२२

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द्वादश प्रभाव २२७ परोसिन को वचन कृष्ण सों, यथा-( सवैया ) (४२३) हाँसी में बातक वासों कही हँसि वेहूँ कही सु हितै करि लेख्यो। आँखें मिली न मिली सखियाँ मिलबोई सु केसव क्यों श्रवरेख्यो। चिच्याइ मरै चुप साधै कि चातक स्वाति समै ही सवै सु बिसेख्यो। आजुहीं क्यों वह आवै यहाँ जिनि आगि लगेंहूँ न आँगन देख्यो।१२। शब्दार्थ-हांसी में = हँसी में, झूठमूठ । बातक = एक बात ( मेरे यहां क्यों आने लगी आदि)। वासों = उससे (नायिका से)। सु- वह बातचीत । हितै करि लेख्यौ = आपने अपने अनुकूल समझ लिया। प्रांखें मिली न% आँखें चार नहीं हुई। अवरेख्यो- निश्चित कर लिया। चिच्याइ मर = चिल्लाकर मरता रहे । चुप साधै कि = अथवा चुप होकर रहे । सवै पानी बरसाता है । सु = वह (बादल)। बिसेख्यो = विशेष रूप से, अत्यधिक । भावार्थ-(पड़ोसिन और नायिका को किसी दिन बातचीत करते हुए नायक ने देखा। पड़ोसिन से नायिका को न आने का उलाहना दिया और नायिका ने भी नायक की ओर देखते हुए हंसी में ही उलाहने का उत्तर देते हुए पाने की बात कही। नायक नायिका से मिलने के लिए उसी दिन पड़ो- सिन के यहां आया है इस पर पड़ोसिन कह रही है ) वाह आप भी अच्छे निकले । उससे हँसी में मैंने एक बात कही और उसने भी हँसी में मुझे कुछ उत्तर दे दिया, इधर आपने उसे ही अपनी घात की बात जान लिया । बद मापसे न पांख मिली और न सखियां ही मिलने के लिए गई तब पाप मेरे यहाँ उससे भेंट होने का निश्चय कैसे कर लिया ? भला वह भलीमानस आज मेरे यहाँ क्यों माने लगी, वह तो ऐसी है कि जब घर में भाग लगी थी तब भी आंगन झांकने नहीं गई। ( भाप चातक की ठान क्यों नहीं ठानते, क्योंकि ) चातक या तो चिचियाता हुमा मरता रहता है या चुप्पी ही साध लेता है। बादल तो स्वाती नक्षत्र में ही उसके ऊपर ध्यान देकर विशेष जल गिराता है ( ढारस रखिए, कभी न कभी माप पर भी उसकी कृपादृष्टि हो ही जायगी)। मालिन को वचन राधिका सों, यथा-( कवित्त) (४२४) दुरिहै क्यों भूषन बसन दुति जोबन की, देह ही की ज्योति होति द्योस ऐसी राति है नाह को सुबास लागें है है कैसी केसव, सुभाव हो की बास भौर-भीर फारे खाति है। १२-बातक-बात थे । वेह-वाह ! हित-हिस्वै । क्यों-के । मर-मरौ । सार्व-सायो । बब-सबै । प्रा०-मावत्ति हो । जिनि-बिहि ।