पृष्ठ:रसिकप्रिया.djvu/१८९

यह पृष्ठ अभी शोधित नहीं है।

१३ नवमं प्रभाव १६३ प्रकार तू उन्हें बकबक करने के लिए प्रेरित करती है क्या ढीठ होकर मुझे भी बकबक कराने आई है (जैसे उनका सिर खपाती है वैसे मेरा भी खपाने आई है ) । इसी से जो कुछ बात तुझसे कहने को भी थी वह भी मुझसे कही नहीं जाती ( कौन तुझसे माथा मारे)। कौन अपनी जांघ उघारकर स्वयम् ही लज्जा से मरे (तुझसे अपना ही भेद खोलकर मैं क्यों पछताऊँ)। एक तो श्रीकृष्ण और सब लोगों से बढ़कर निर्लज्ज हैं, क्या मैं अब उनसे भी बढ़कर निर्लज्ज हो जाऊँ? सूचना-नायिका ने बात करते सुना है अतः मध्यममन। जिससे बात हुई है उसी से बातें हो रही हैं, अतः 'प्रकाश' है । अलंकार-लोकोक्ति । अथ प्रिय को मध्यममान-लक्षण-(दोहा) (३५६) जहाँ न मानै मानिनी, हारै पिय जु मनाइ । उपजत मध्यम मान तह, प्रीतम के उर आइ ।१८। शब्दार्थ -मनाइ हार = मनाते मनाते थक जाय । श्रीकृष्णजू को प्रच्छन्न मध्यममान, यथा-( कबित्त) (३५७) बार बार बरजी मैं सारस सरस मुखी, आरसी लै देखि मुख भारत में बोरिहै । सोभा के निहोरे ते निहारति न नेकहूँ तूं, हारी हैं निहोरि सब कहा काहू खोरि है । सुख को निहोरो जु न मान्यो सो भली करी तें; केसौदास की सौ तोहि जौ तूं मुँह मोरिहै । नाह के निहोरें किन मानहि निहोरति हौं, नेह के निहोरें फिर मोही जु निहोरिहै ।१९ । शब्दार्थ-बरजी=मना किया। सारस = कमल । सरस = रसीला, रसमय । आरसी = दर्पण। पारस में बोरिहैपालस्य में डुबो देगी, मलिन कर देगी। निहोरे = कारण, बहाने । खोरि = दोष, अपराध, त्रुटि । सौं = सौगंध, शपथ । मुख मोरिहै = विमुख या प्रतिकूल होगी । किन = क्यों नहीं । निहोरति हौं = मनाती हूँ। निहोरें = विवश करने पर । भावार्थ-( सखी ने मान करते समय नायिका को समझाया था कि मान मत कर तुझे पीछे पछताना पड़ेगा। पर उसने मान किया, नायक के १५–पिय जु-पीउ । १६-पारस-या रस । तें-तौ, त्यों । जु-जो । ते-न, ब । केसौदास-केसोराय । ताहि-मव । मुह-मुख, मन । किन-किहि । मानहि-मानति । मोही-मोहू । जु-तू ।