पृष्ठ:रसिकप्रिया.djvu/१४६

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१४८ रसिकप्रिया उपज्यो० -अथवा उनके निर्मल हृदय में वैराग्य उत्पन्न हो गया है। सुख में न देह शरीर सुख में नहीं है, अस्वस्थ हैं। कपट-नेह = दिखौमा प्रेम । मेह = वर्षा । अधरात तें = आधी रात हो जाने के कारण। प्रतीति = विश्वास । प्रतीति लेना-परीक्षा करना, जांच करना । मन = हे मन । सु धों -सो न जाने । कौनी बात तें-किस कारण से । प्रकाश उत्का, यथा- --( सवैया) (२४६) सुधि भूलि गई, भुलए किधौं काहु कि भूलेई डोलत बाट नपाई। भीत भए किधौं केसव काहू सों, भेंट भई कोऊ भामिनि भाई। मग आवत हैं किधौं आइ गए, किधौ आवहिंगे सजनी सुखदाई। अब आए न नंदकुमार बिचारि, सु कौन बिचार अबार लगाई।। शब्दार्थ-सुधि = स्मृति, स्मरण । भुलाए० = किसी ने भुलावा दे रखा हैं, किसी ने अपने चक्कर में फंसा रखा है। भूलेई डोलत = मार्ग भूलकर घूम रहे हैं । बाट=मार्ग, रास्ता । भीत-भयभीत । भामिनि = स्त्री, नायिका । भाई = अच्छी लगी। मग:-( मार्ग) रास्ता । बिचारि = तू विचार कर । बिचार = कारण । अबार%देर । अथ वासकसज्जा-लक्षण-(दोहा) (२४७) बासकसज्जा होइ.सो, कहि केसव सबिलास | चितवै रतिगृहद्वार त्यौं, पिय-वन की आस ।१०। शब्दार्थ- सबिलास = विलासपूर्वक, विलासयुक्त । रतिगृह =प्रिय से मिलने का गृह । त्यौं -पोर । वासकसज्जा, यथा-( कबित्त ) (२४८) चंदन बिटप बपु कोमल अमल दल, कलित ललित लता लपटी लवंग की केसौदास तामें दुरी दीप की सिखा सी दौरि, दुरवति नीलबास दुति अंग अंग की। पौन पानी पंछी पसु बस सब्द जित जित होइ तित तित चौंकि चाहै चोप संग की। नंदलाल-पागम बिलोके कुजजाल बाल लीनी गति तेही काल पंजर-पतंग की।११ -यथा सवैया-मदनमनोहर छंद । कि-के । काहू सों-काहू के । कोऊ- कोई । मग प्रावत हैं मग प्राइ गए। आइ०-पाए गए। अब आए-पाए। बिचारि--सखी सुनु कौने । बिचारि-विचारु । १०-चितवै०- चिते रहे। ११ कलित-बलित, बिमल । दुरवति.. 10--दरसत । पानी-पान | बस०-बसै सदा जित जिन, सब्द जित जित । होइo-होइ तित तित चौकि चाहै, बास सदा जित जित होइ ) बिलो --बिलोकिबे को कुंज बाल । लोनी--कोनी । तेहीं-तिहीं।