पृष्ठ:रसिकप्रिया.djvu/१०२

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चतुर्थ प्रभाव १०३ बोले तथा बिना उसकी बोली सुने एवम् बिना उससे हिले. मिले केवल मुग्ध होकर रह जाने से ही तो काम चल नहीं सकता। अपने नेत्रों को कब तक अलोना रूप ( चित्र के दर्शन से ) पिला पिलाकर शांत रख । (केवल चित्र में उसकी छाया देख. लेने से नेत्रों की तृप्ति नहीं होती ) । क्या जल (पानिप, शोभा) देख लेने पर मछली (आँख ) धैर्य धारण कर सकती है ? (चित्र देखने पर उसको प्रत्यक्ष देखने की उत्कट इच्छा होना नेत्रों के लिए स्वाभा- विक है)। ऐ मन, उस चित्रिणी का विचित्र चित्र • सँभलकर देख, चित्र देख देखकर संतोष करते रहने से तो चित्त चौगुना जलता है (अभिलाष उत्कट होता जाता है )। श्रीकृष्णजू को प्रकाश चित्रदर्शन, यथा-( सवैया ) (१३१) अंतरिच्छ-गच्छनीनि यच्छनि सुलच्छनीनि, अच्छी अच्छी अच्छनीनि छबि छमनीय है। किंनरी नरी सुनारि पन्नगी नगी कुमारि, आसुरी सुरीनिहूँ निहारि नमनीय है। भोगिन की भामिनी कि देह धरे दामिनी कि, काम ही की कामिनी कि ऐसी कमनीय है। चित्रहू में चित्तहि चुरावति है केसौदास, राम की सी रमनी रमा सी रमनीय है ।११॥ शब्दार्थ-अंतरिच्छ-गच्छनी = आकाशचारिणी। यच्छनीयक्षिणी । सुलच्छनी = शुभलक्षणसंयुक्ता । अच्छनीनि = नेत्रोंवाली। छमनीय है- क्षमा करने योग्य है, क्षमा करने की योग्यता रखती है। किंनरी =किनरों की स्त्रियाँ । नरी = मानवी। सुनारि = सुंदर स्त्रियाँ । पन्नगीनागकुमारी। नगी = पर्वतकन्याएँ । निहारि = देखकर, देखने पर । भोगिन की भामिनी - पातालवासियों की स्त्री। कि = अथवा । नमनीय = नमस्कार करने योग्य। देह धरे = मूर्तिमती । दामिनी = बिजली। काम कामिनी = कामदेव की स्त्री रति । कमनीय = सुंदर । राम कैसी रमनी = सीता सी। रमा = लक्ष्मी। रमनीय = मन को लुभानेवाली। भावार्थ-(नायक-वचन सखी प्रति ) आकाशचारिणी, सुलक्षणा यक्षिणी सुनयनाओं की शोभा को भी यह क्षमा करनेवाली है ( इसकी शोभा ऐसी है कि वे ईर्ष्या करती हैं और यह उन्हें अपने सौंदर्याधिक्य के कारण क्षमा कर देती है-अर्थात् इसकी शोभा उनसे बहुत बढ़ी चढ़ी है) किनरियाँ, सुंदर मानवी स्त्रियाँ, नागकन्याएँ, पर्वतकन्याएँ, असुरपत्नियां और सुरपत्नियां ११-कि-यो । काम-कामनीयो कहा । चुरावति०-चुराए लेति कोळ यह ।