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पण्डित महावीरप्रसादजी द्विवेदी
 

आने लगी। परिणामस्वरूप हिन्दी का रूप ही बिगड़ जाने की आशंका होने लगी। प्रवाह की तीव्रता के कारण सारे बन्धन टूट गये। ऐसी स्थिति में द्विवेदीजी हिन्दी-क्षेत्र में आये अपनी प्रतिभा के बल से उन्होंने पद्य तथा गद्य दोनों पर अपना शुभ प्रभाव डाला।

कविता—जैसा पहले कहा गया है, द्विवेदीजी के समय में ब्रज और खड़ी बोली का प्रश्न तीव्र रूप में था। यद्यपि पं॰ श्रीधर पाठक और पं॰ नाथूरामजी शर्मा 'शङ्कर' ने खड़ी बोली को अपनाकर उसे माँजने का प्रयत्न किया, पर इस ओर सबसे अधिक प्रभाव द्विवेदीजी ही का पड़ा। "सरस्वती" में तो अपनी कविता आप छापते ही थे पर साथ ही 'कविता-कलाप' 'काव्य-मंजूषा' तथा 'सुमन' आदि कविता संग्रह एवं 'कुमारसम्भवसार' आदि अन्य ग्रन्थ भी आपने प्रकाशित कराये। यद्यपि जैसा द्विवेदीजीने 'रसज्ञ-रंजन' में कहा है, वे अपने को कवि नहीं मानते थे, पर इसमें सन्देह नहीं कि खड़ी बोली का रंग गाढ़ा करके तथा कविता में सामयिकता तथा उपयोगिता का समावेश करके आपने कविता को एक नए और निश्चित मार्ग पर डाला, जिससे प्रभावित होकर खड़ी बोली के अनेकानेक कविवर मैदान में आये। बाबू मैथिलीशरण गुप्त, पं॰ रामचरित उपाध्याय, पं॰ लोचनप्रसाद पाण्डेय तो इनके उत्साहित शिष्यों में हैं ही, पर साथ ही 'सनेही', ठाकुर गोपालशरणसिंह, बाबू सियारामशरण गुप्त, पं॰ लक्ष्मीधर वाजपेयी आदि पर भी द्विवेदीजी का प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष प्रभाव विद्यमान है। स्वयं एक बड़े कवि न होते हुए भी आप एक बहुत बड़े कवि-निर्माता अवश्य थे।

गद्य—कविता से भी अधिक द्विवेदीजी का प्रभाव हिन्दी गद्य के ऊपर पड़ा है। इस क्षेत्र में सबसे बड़ा काम गद्य के स्वरूप की रक्षा करना था। जो व्याकरण दोष, लचरपन तथा विदेशी वाक्य-विन्यास की बू गद्य में स्थान पा रही थी उसका नियन्त्रण करना आपका प्रथम कार्य था। "इच्छा किया" आदि प्रयोगों