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९—नल का दुस्तर दूत-कार्य
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तुम मुझ को अपना दास बनाने का आग्रह कर रही हो। यह बड़े ही असमञ्जस की बात है। खैर जो कुछ करना, बहुत सोच समझ कर करना। ऐसा न हो कि तुम्हें पीछे पश्चात्ताप करना पड़े। मेरी इस सलाह को तुम पक्षपात-दूषित मत समझो। यह सलाह मैं देवताओं के डर से नहीं दे रहा और न इसलिए दे रहा कि तुम में मेरा अनुराग ही कम है। नहीं, बात ऐसी नही। मैं पक्षपात रहित होकर तुम्हारे हित की आकांक्षा से ही ऐसी सलाह देने को बाध्य हुआ हूँ। मैं अपनी दशा का तुम से क्या वर्णन करूँ! तुम्हारे हित के लिए—तुम से उऋण होने के लिए यदि मुझे अपने प्राण भी दे देने पड़े तो भी मैं सुख पूर्वक उनका समर्पण करने को तैयार हूं। तुमने मुझपर जो कृपा की हैं उसके बदले में यदि मेरे प्राण भी तुम्हारे किसी काम आ सकें, तो उनके दान से भी मैं अपने को कृतार्थ समझूँगा।

नल की इस पीयूष वर्षिणी वाणी को सुन कर दयमन्ती को परमानन्द हुआ। नल को पर-पुरुष समझ कर, उसके सामने बातें करने के कारण, उसके हृदय में जो घृणा और आत्म-निन्दभाव उदित हुआ था, वह सब जाता रहा। परन्तु नल के सामने तद्विषयक अपने अनुराग आदि को प्रकट करने के कारण उसे बेतरह सङ्कोच हुआ। वह लज्जा से अभिभूत हो उठी। उसके मुँह से फिर एक भी शब्द न निकला! उसकी यह दशा देखकर उसकी सहेली अपना कान उसके मुँह के पास ले गई। परन्तु तब उसकी सहेली ने मुसकरा कर नल से कहा—सरकार प्रियतमा पर लज्जा ने यहां तक अपना अधिकार जमा लिया है कि अब वह आपके सम्मुख अपने मुख से एक अक्षर तक भी निकालने में समर्थ नहीं। उसके मौन-धारण का और कोई कारण नहीं, कारण केवल लज्जा है। अतएव आप उस पर अप्रसन्न न