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१८४ उद्दीपन-विभाग 0 दूती सदेश ले जानेवाली, नायक-नायिका में संयोग करानेवाली भौर समयोपयोगी वचन-रचना में निपुण स्त्री को दूती कहते हैं। वह तीन प्रकार की होती है-उत्तमा, मध्यमा और अधमा । उसके कर्म छः हैं; १-विनय, २-स्तुति, -निदा, ४-प्रबोध, ५-सघट्टन, ६-विरहनिवेदन। कभी नायिका स्वय भी दूतत्व करती है उसे स्वयदूतो कहते हैं। उदाहरण वित्त-~~ छवि अवलोके मैलो लगत छपाकर है लोल - लोल-लोचन विलोके ललचाति है। मधुमयी मंजु - मुसुकान चित चोरति है मोहनी पै मोहि मोहि मोहित दिखाति है। 'हरिऔध' कमनीय - काम सम तन हेरि कामिनी की सारी-मान-कामना हेराति है। रिस - भरी रस - भरे सैनन ते सरसाति सीरे-सीरे-बैनन ते सीरी परि जाति है ।।१।। मवैया- आनन-चंद की जो है चकोरिका चित्त ते ताहि उतारत लाजें चातकी जो धन से तन की अहै तापै न गाज गिराइ के गाऊँ। जो 'हरिऔध' सुधा न पिावत तो वसुधा मैं बसेहुँ न भाजें। जो सुख-साजन ते न सजावत साजन तो दुख-साज न साजै ||२ दृती-प्रकार मधुर और प्रिय वचनों द्वारा अपना कार्य साधन करनेवाली को उत्तमा, कुछ मधुर कुछ तीखी बातो से काम लेनेवाली को मध्यमा और उग्रस्वभावा तथा मधुर-कटुवादिनी को अधमा दूती कहते हैं।