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(दसवां
रज़ीयाबेगम।


दसवां परिच्छेद

नई जलन।

"कहूं क्या मैं तुमसे कि क्या चाहता हूं।
जफ़ा होचुकी अब बफ़ा चाहता हूं ॥
न वस्लत से मतलब न फुर्कत से मतलब ।
फ़क़त मैं तुम्हारी रज़ा चाहता हूँ ॥"

(सफ़दर)

बाग़ में आकर अपनी सहेलियों और बांदियों के साथ रजीया बेगम यद्यपि टहल रही थी, पर उसके उतरे हुए चेहरे और चढ़ी हुई आंखों से उसके दिल की बेचैनी साफ़ झलक रही थी, चाहे वह किसी सबब से हो।

यही हाल सौसन और गुलशन का भी था, पर वे बेचारी पराधीन होने के कारन इस बात के लिये हज़ार कोशिश कर रही थीं कि जिसमें इस बेचैनी का हाल बेगम को न मालूम हो; इस लिये उन दोनो के चेहरे से और भी ज़ियादहतर परेशानी की झलक निकल रही थी।

इन तीनों के अलावे रज़ीया बेगम की मुहलगी बांदी, जोहरा के मुखड़े से भी एक तरह की उदासी उछली पड़ती थी, पर इसमें उन तीनों-अर्थात, बेगम और उसकी सहेलियों से इतना भेद था कि जिसका एकाएक जान लेना सहजही नहीं बरन असम्भव भी था। वह, यह कि जोहरा के चेहरे की उदासी की छाया में से कुछ क्रोध या डाह के आग की लपट भी कभी कभी इस तरह निकल पड़ती थी, जैले धुधुंवाती हुई लकड़ी में से निकलते हुए धुएँ के अन्दर से कभी कभी आग की लौर भी निकल पड़ती और फिर उस धुएं में समा जाती है।

टहलते टहलते वे सब एक सुन्दर तालाब के किनारे पहुंची और बेगम वहां पर एक संगमर्मर की कुर्सी पर बैठ गई । संदली तिपाईयों पर सौसन और गुलशन बैठीं और बांदियां अगल बगल