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परिच्छेद)
५७
रङ्गमहल में हलाहल।

नवां परिच्छेद.

आंखें लड़ी।

क़यामत है, किसीको प्यार करना इस ज़माने में।
कज़ा का सामना रक्खा हुआ है, दिललगाने में ॥
यही आलम रहे, बस मौसिमे गुल का ज़माने में।
रहें आबाद बुल बुल, अपने अपने आशियाने में ॥"

(सवा)

अल्लाह ! वह बुलबुल, जो अभी इस डाल पर बैठी बैठी चहक रही थी; किधर उड़गई ! अफ़सोस ! बाद मुद्दत के एक दिल्लगी नसीब हुई थी, बदकिस्मती ने 'उसे भी ज़ियादह देर तक काइम न रहने दिया।"

दिन के दो बजे के समय शाही बाग में एकलसा-मंडप के अन्दर संगमर्मर की चौकी पर बैठा हुआ; अयूब वहीं पर डाल पर बैठी बैठी एक चहकती हुई बुलबुल की सुरीली आवाज़ सुन रहा था । थोड़ी देर में कुछ आहट पाकर बुलबुल उड़ गई । और अयूब ने ऊपर कहे हुए जुमले को बड़े खेद के साथ कहा । चट किसीने लताओं की ओट से उसकी बात का यह जवाब दिया,-

बुलबुल के एवज़ में गुल से दिल शाद करना क्या नामुना- सिब होगा!"

यह आवाज़ बुलबुल की आवाज़ से भी सुरीली और नज़ाकत से भरी हुई थी, जो किसी नाज़नी के गले की मालूम देती थी; उसे सुन कर अयूब चिहुंक उठा और चौकी पर से उठ इधर उधर देखने लगा; पर उसे कोई दिखलाई न दिया । आखिर, वह फिर बैठ गया और कहने लगा,-

अल्लाह ! क्या गुल में भी ऐसी जानदार, सुरीली आवाज़ का होना मुमकिन है?"

फिर किसीने लताओं की ओर से जवाब दिया,-

"खुदा के फ़ज़ल से ऐसा होना मुमकिन है ; क्योंकि अगर

(८) न०