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(पांचवां
रज़ीयाबेगम।

अपनी उन दोनों सहेलियों-सौसन और गुलशन के साथ कुछ थोड़ा बहुत नाश्ता किया । सौसन ने गुलशन को भी एक प्याला शराब का पिलाया, पर खुद एक घूंट भी न पीया।

गानेवालियां अपने साज सामान से दुरुस्त होकर आ पहुंची और शाहानः आदाब बजा लाकर क़रीने से बैठ, गाने बजाने लगीं। ये सब कमसिन, खूबसूरत, नाजुकबदन और गाने बजाने के फ़न में पूरी उस्ताद थीं। ये औरतें खारज़म की रहने वाली थीं, किन्तु बदकिस्मती या खुशकिस्मती से अब सुल्ताना रज़ीया बेगम के हरम की लौंडियां बनकर रहतीं और गाने बजाने, नाचने की तालीम पाकर वही काम किया करती थीं।

इनकी गिनतो, जो इस समय बेगम के रूबरू कमरे में आकर बैठी हुई हैं, बीस के लगभग है और सभी के हाथ में कोई न कोई बाजा भी है। उनमें से एक ने, जो उन सभों में खूबसूरती, नज़ा- कत और नांज़ नख़रे में चढ़ी बढ़ी थी, अर्ज़ किया,-

"जहांपनाह ! नाच शुरू किया जाय?"

रज़ीया,-' नहीं, फ़क़त बैठकी मुजरा हो।"

यह सुनकर उन सभों ने अपने मिले हुए साज की फिर से जांच की और इस ग़ज़ल को गाना शुरू किया,-

"बता दें, हम तुम्हारे आरिज़ो काकुल को क्या समझे।
उसे हम सांप समझे, और इसे मन सांप का समझे ॥
य क्या तशबीः है बेहूदः य क्यों मूज़ी से निसबत दें।
उसे वर्क, और इसे सावन की हम कारी घटा समझे ॥
घटा औ वर्क क्या है, क्यों घटा कर इनकी निसबत दें।
उसे वर्गे समन, और इसको सुंबुल की जटा समझे ॥
नवाताते ज़मीं से इनको क्या निसवत माज़ अल्लाह ।'
हुमा आरिज़ को, औ काकुल को हम जुल्ले हुमा समझे।
ग़लतही हो गई तशबीह यह भी एक तायर से।
उसे जुल्मात, इसको चश्मए आबेबका समझे।
जो कहिए, यह फ़क़त मक़सूद थी खूसरो सिकन्दर के ।
यदेबैज़ा उसे, और इसको मूसा का असा समझे।
अगर यह भी पसन्दे ख़ातिरे बाला न आवोतो।
उसे वक्त नमाजे सुबह, और इसको अशा समझे॥