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रघुवंश।

न हो जाती। वह बीच में बैठ जाता और आस पास सिंहासन खाली रह जाता। परन्तु शरीर से वह छोटा था तो क्या हुआ, तेजस्विता में वह बहुत बढ़ा चढ़ा था। उसके शरीर से सुवर्ण के समान चमकीला तेज जो निकलता था वह चारों तरफ़ इतना फैल जाता था कि उससे सारा सिंहासन भर सा जाता था। अतएव उसका कोई भी अंश खाली न मालूम होता था। सिंहासन पर बैठ कर वह महावर लगे हुए अपने पैर नीचे लटका देता। पर वे सोने की उस चौकी तक न पहुँचते जो सिंहासन के नीचे पैर रखने के लिए रक्खी रहती थी। वह बच्चा था ही। अतएव पैर छोटे होने के कारण ऊपरही कुछ दूर लटके रह जाते। सैकड़ों अधीन राजा अपने रत्नखचित और उच्च मुकुट झुका झुका कर उन्हीं छोटे छोटे पैरों की वन्दना करते। मणि छोटी होने पर भी, अपनी प्रकृष्ट प्रभा के कारण, जैसे 'महानील' मणि ही कहलाती है—उसका 'महानील' नाम मिथ्या नहीं होता वैसेही, यद्यपि सुदर्शन निरा बालक था, तथापि प्रभावशाली होने के कारण, 'महाराज' की पदवी उसके विषय में मिथ्या न थी—वह सर्वथा उसके योग्यही थी।

जिस समय सभा में आकर सुदर्शन बैठता उस समय उसके दोनों तरफ़ चमर चलने लगते और उसके सुन्दर कपोलों पर लटके हुए काक-पक्ष बहुतही भले मालूम होते। इस बाल-राजा के मुख से जो वचन निकलते उनका सर्वत्र परिपालन होता; कोई भी ऐसा न था जो उनका उल्लङ्घन कर सकता। समुद्र के तट तक उसकी आज्ञा के अक्षर अक्षर का पालन होता।

उसके सिर पर ज़री का बहुमूल्य पट्टवस्त्र और ललाट पर मनोहारी तिलक बहुतही शोभा पाता। बालपन के कारण उसके मुख पर मुसकराहट सदाही विराजमान रहती। उसके प्रभाव का यह हाल था कि जिस तिलक से उसने अपने ललाट की शोभा बढ़ाई उसी से उसने अपने शत्रुओं की स्त्रियों के ललाट सूने कर दिये—शत्रुओं का संहार करके उनकी स्त्रियों को विधवा कर डाला।

उसका शरीर सिरस के फूल से भी अधिक सुकुमार था। उसके अङ्ग इतने कोमल थे कि आभूषण का बोझ भी उसे कष्टदायक ज्ञात होता था। तिस पर भी स्वभावही से वह इतना सामर्थ्यशाली था कि पृथ्वी का अत्यन्त भारी बोझ उठाने में भी उसे प्रयास न पड़ा।

सुदर्शन जब कुछ बड़ा हुआ तब उसने विद्याध्ययन आरम्भ किया। उससे पट्टी पर लिखी हुई वर्णमाला का अभ्यास कराया जाने लगा। जब