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सत्रहवाँ सर्ग।

में लिखा है कि छल से भी वैरी को जीतना चाहिए। अश्वमेध जैसे कार्य्य के निमित्त युद्ध करने में इस नीति के अनुसार काम करना तो और भी अधिक युक्तिसङ्गत था। तथापि राजा अतिथि ने धर्म के अनुकूल ही युद्ध करके दिग्विजय किया। अधर्म्म और अन्याय का उसने एक बार भी अवलम्बन न किया।

इस प्रकार सदा ही शास्त्रसम्मत मार्ग पर चलने के कारण अतिथि का प्रभाव इतना बढ़ गया कि वह—देवताओं के देवता इन्द्र के समान—राजाओं का भी राजा हो गया।

राजा अतिथि को इन्द्र आदि चार दिक्‌पालों, पृथ्वी आदि पाँच महाभूतों और महेन्द्र आदि सात कुल-पर्वतों के सदृश ही काम करते देख, साधर्म्य के कारण, सब लोग अतिथि को पाँचवाँ दिक्‌पाल, छठा महाभूत और आठवाँ कुलपर्व्वत कहने लगे।

राजा अतिथि के प्रताप और प्रभाव का सर्वत्र सिक्का बैठ गया। देवता लोग जैसे देवेन्द्र की आज्ञा को सिर झुका कर मानते हैं वैसे ही शासनपत्रों में दी गई राजा अतिथि की आज्ञा को, देश-देशान्तरों तक के भूपाल, अपने छत्रहीन सिंर झुका झुका कर, मानने लगे। अश्वमेध यज्ञ में उसने ऋत्विजों को इतना धन देकर उनका सम्मान किया कि वह भी कुबेर कहा जाने लगा—उसके और कुबेर के काम में कुछ भी अन्तर न रह गया।

राजा अतिथि के राजत्व-काल में इन्द्र ने यथासमय जल बरसाया। रागों की वृद्धि रोक कर यम ने अकालमृत्यु को दूर कर दिया। जहाज़ों और नावों पर आने जाने वालों के सुभीते के लिए वरुण ने जलमार्गों को हर तरह सुखकर और सुरक्षित बना दिया। अतिथि के पूर्व्वजों के लिहाज़ से कुबेर ने भी उसके ख़जाने को ख़ूब भर दिया। अतएव यह कहना चाहिए कि दिक्‌पालों ने—दण्ड के डर से अतिथि के वशीभूत हुए लोगों के सदृश ही—उसके साथ व्यवहार किया। अर्थात् वे भी उसके अधीन से होकर उसके काम करने लगे ।

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