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रघुवंश।

पेड़ की यह दशा हुई देख लवणासुर ने सैकड़ों मन वज़नी एक पत्थर, यमराज के शरीर से अलग हुए उसके मुक्के की तरह, शत्रुघ्न पर चलाया। शत्रुघ्न ने इन्द्र-देवतात्मक अस्त्र उठा कर उस पर ऐसा मारा कि वह पत्थर चूर चूर हो गया। वह पिस सा गया; उसके परमाणु रेत से भी अधिक बारीक हो गये। तब, प्रलयकाल की आँधी के उड़ाये हुए, ताड़ के एकही वृक्ष वाले पर्वत की तरह—अपनी दाहनी भुजा उठा कर, वह शत्रुघ्न पर दौड़ा। यह देख कर शत्रुघ्न ने विष्णुदेवता-सम्बन्धी एक बाण ऐसा छोड़ा कि वह लवणासुर की छाती फाड़ कर पार निकल गया। इस बाण के लगते ही वह निशाचर अररा कर पृथ्वी पर गिर पड़ा। उसके गिरने से पृथ्वी तो कँप उठी, पर आश्रमवासी मुनियों का कँपना बन्द हो गया। यमुना-तीर-वर्ती ऋषि और मुनि, जो अब तक उसके डर से कँपते थे, निर्भय हो गये। इधर उस मरे हुए राक्षस के ऊपर तो मांसभक्षी पक्षियों के झुण्ड के झुण्ड टूट पड़े; उधर उसके शत्रु शत्रुघ्न के शीश पर आकाश से दिव्य फूलों की वर्षा हुई।

लवणासुर को मारने से वीर-वर शत्रुघ्न को बड़ी ख़ुशी हुई। उन्होंने कहा—"इन्द्रजित का वध करने से बढ़ी हुई शोभावाले परम तेजस्वी लक्ष्मण का सहोदर भाई, मैं, अपने को, अब, अवश्य समझता हूँ। यह काम मेरा अवश्य अपने भाई के बल और विक्रम के अनुरूप हुआ है"।

लवण के मारे जाने पर उसके सताये हुए सारे तपस्वियों ने अपने को कृतार्थ माना और शत्रुघ्न की स्तुति आरम्भ कर दी। प्रताप और पराक्रम से उन्नत हुए अपने सिर को शत्रुघ्न ने, उस समय, मुनियों के सामने झुका कर नम्रता दिखाई। पराक्रम के काम कर के भी, अपनी प्रशंसा सुनने पर, लज्जित होना और सङ्कोच से सिर नीचा कर लेना ही सच्ची वीरता का सूचक है। ऐसे ही व्यवहार से वीरों की शोभा होती है।

पुरुषार्थ ही को सच्चा भूषण समझने वाले और इन्द्रियों के विषय-भोग की ज़रा भी इच्छा न रखने वाले मधुरमूर्ति शत्रुघ्न को वह जगह बहुत पसन्द आई। इस कारण, उन्होंने, यमुना के तट पर, मथुरा नाम की एक पुरी बसाई और आप उसके राजा हो गये। ऐसा अच्छा राजा पाकर पुरवासियों की सम्पदा दिन-दूनी रात चौगुनी बढ़ने लगी। सभी कहीं सुख, सन्तोष और समृद्धि ने अपना डेरा जमा दिया। अतएव, ऐसा मालूम होने लगा जैसे स्वर्ग में बसने से बचे हुए मनुष्य लाकर मथुरा बसाई गई हो।

अपनी बसाई हुई पुरी की शोभा ने शत्रुघ्न का मन मोह लिया। अपने