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रघुवंश।

होना उन्हें मूर्च्छित होने से भी अधिक दुःखदायक हुआ। आहा! जानकीजी की सुशीलता का वर्णन नहीं हो सकता। यद्यपि उनके पति ने उन्हें, निरपराध होने पर भी, घर से निकाल दिया, तथापि, उनके मुँह से, पति के विषय में, एक भी दुर्वचन न निकला। उन्होंने बार बार अपने हीं को धिक्कारा; बार बार अपनी ही निन्दा की; बार बार जन्म के दुखिया अपने हीं जीवन का तिरस्कार किया।

लक्ष्मण ने महासती सीताजी को बहुत कुछ आसा-भरोसा देकर और बहुत कुछ समझा बुझा कर वाल्मीकि मुनि के आश्रम का रास्ता बता दिया और वहीं जाकर रहने की सलाह दी। फिर उन्होंने सीताजी के पैरों पर गिर कर उनसे प्रार्थना कीः—

"हे देवी! मैं पराधीन हूँ। पराधीनता ही ने मुझसे ऐसा कर कर्म्म कराया है। स्वामी की आज्ञा से मैंने आपके साथ जो ऐसा कठोर व्यवहार किया है उसके लिए आप मुझे क्षमा करें। मैं, अत्यन्त नम्र होकर, आपसे क्षमा की भिक्षा माँगता हूँ"।

सीताजी ने लक्ष्मण को झट पट उठा कर उनसे इस प्रकार कहना आरम्भ कियाः—

हे सौम्य! तुम बड़े सुशील हो। मैं तुमसे बहुत प्रसन्न हूँ। तुम चिरञ्जीव हो। तुम्हारा इसमें कोई दोष नहीं। तुम तो अपने जेठे भाई के उसी तरह अधीन हो जिस तरह कि विष्णु इन्द्र के अधीन हैं। और, स्वामी की आज्ञा का पालन करना अधीन का कर्त्तव्य ही है।

"मेरी सब सासुओं से मेरा यथाक्रम प्रणाम कहना और कहना कि मेरी कोख में तुम्हारे पुत्र का गर्भ है। हृदय से तुम उसकी कुशल-कामना करो; आशीष दो कि उसका मङ्गल हो।

"और, उस राजा से मेरी तरफ़ से कहना कि मैंने तो तुम्हारी आँख के सामने ही आग में कूद कर अपनी विशुद्धता साबित कर दी थी। फिर भी जो तुमने पुरवासियों की की हुई अलीक चर्चा सुन कर ही मुझे छोड़ दिया, वह क्या तुमने अपने कुल के अनुरूप काम किया अथवा शास्त्र के अनुरूप? रघु के उज्ज्वल वंश में जन्म ले कर और सारे शास्त्रों का मर्म्म जान कर भी क्या तुम्हें मेरे साथ ऐसा ही व्यवहार करना उचित था! अथवा तुम्हें मैं क्यों दोष दूँ। तुम तो सदा ही दूसरों का कल्याण चाहते हो; कभी भी किसी का जी नहीं दुखाते। अतएव, मैं यह नहीं कह सकती कि तुमने अपने ही मन से मेरा परित्याग किया है। यह परित्याग मेरे ही जन्म-जन्मान्तरों के पापों का फल है। इसमें तुम्हारा क्या अपराध? जान पड़ता है, यह करतूत